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इन्तज़ार

इन्तज़ार

हमारे गाँव में पवन के पिताजी की करियाने की दुकान थी। वह अपने पिताजी की तरह मोटू व अकड़ू था। मेरे पिताजी नगर की नगरपालिका में क्लर्क थे, रोज छः किलोमीटर साइकिल चला कर दफ़्तर जाते और शाम को घर लौटते। पवन के अतिरिक्त हमारे साथ में वह भी खेलती थी- पड़ोस की हमउम्र नाजुक-नरम सी लड़की।
उसके पिताजी शहर के सरकारी स्कूल में अध्यापक थे। वे भी साइकिल से शहर जाते थे। उनका स्कूल दोपहर में समाप्त हो जाता था तो वे दोपहर ढलने तक गाँव वापस आते थे।
पिताजी नहीं चाहते थे कि मैं पवन के साथ खेलूं। वह ऐसी-ऐसी गालियाँ देता, जिन्हें सुनना भी हमारे यहाँ पाप माना जाता। वैसे भी उसे पढने-लिखने में रुचि नहीं थी, क्योंकि उसे तो बड़े होकर अपने पिताजी की दुकान ही संभालनी थी। लेकिन मेरे पिताजी मुझे पढ़ा-लिखा कर अफ़सर बनाने का सपना संजोए बैठे थे।
मास्टर जी बहुत सीधे-सादे आदमी थे, अपनी बेटी से बहुत प्यार करते थे। वह थी ही प्यार करने लायक। बड़ी प्यारी और बड़ी मोहिनी। मेरे पिताजी तो सारे दिन घर में होते नहीं थे। माँ घर के कामकाज में लगी रहती थीं। तब हम गाँव के ही छोटे से स्कूल में ही पढ़ते थे। स्कूल खत्म होते ही हम तीनों खेल में जुट जाते, तरह-तरह के खेल खेला करते। पवन को गुड्डे-गुडियों के खेल पसंद नहीं थे, ताश-लूडो खेलना हम जानते नहीं थे। तो हम घर-घर खेलते। पवन हमेशा ही घर वाला बनता, वो घर वाली और मैं नौकर। कभी पवन बन्ना बनता, वह बन्नो बनती और मैं पंडित बनता।
पवन किसी खेल का दांव कभी नहीं चुकाता था। खेलता, फिर बस्ता उठाता और चल देता। वह हमेशा उसी की घर वाली या बन्नो बनकर रह जाती। मेरा दांव तो कभी आता ही नहीं था और मैं नौकर या पंडित बनकर रह जाता। मुझे गुस्सा तो बहुत आता, लेकिन पवन इतना अकड़ू था कि उससे लड़ने की हिम्मत मैं कभी जुटा नहीं पाया।
एक दिन हम शादी-शादी खेल रहे थे। हमेशा की तरह पवन बन्ना बना हुआ था और वह बन्नो।
पंडित ने दोनों की शादी की रस्म पूरी कराई ही थी कि पवन अपने घर चल दिया। मैं तिलमिला गया। मैंने हिम्मत जुटाई और चिल्लाया- मेरा बारी देकर जा !
उसने मुझे पलट कर भी नहीं देखा, बस चलते-चलते ही चिल्ला कर बोला- नहीं देता जा..।
उस दिन मैं बदला लेने को आमादा था, इसलिए पूरी ताकत लगा कर कहा- बारी नहीं देगा तो तेरी बन्नो मैं रख लूंगा..
वह फिर भी नहीं मुडा। वैसे ही हवा में हाथ उड़ाता सा बोला- जा रख ले..
मैं रुआंसा हो आया, हाथ-पैर कांपने लगे। तभी वह मेरे पास आकर खड़ी हो गई। उसने अपने कोमल हाथों से मेरे गालों पर ढुलक आए आँसू पोंछे और बोली- कोई बात नहीं, आज से मैं तेरी बन्नो ! खुश हो जा।
मैं शायद खुश हो भी गया था।
धीरे-धीरे हम बड़े हो गए। हमारी पढ़ाई गाँव में जितनी होनी थी, हो गई थी। जैसा कि तय था, पवन अपने पिताजी की दुकान पर बैठने लगा और मेरे पिताजी ने मेरा दाखिला शहर के स्कूल में करवा दिया। मैं रोज सुबह उठता, तैयार होकर भारी बस्ता पीठ पर लाद कर छः किलोमीटर दूर स्कूल के लिए चल पड़ता। जब तक घर वापस आता, सांझ ढलने को होती। मैं पस्त हो जाता, लेकिन पिताजी मेरा हौंसला बढ़ाते रहते, वो मुझसे कहते- तुम्हें तो अफसर बनना है।
मास्टर जी ने अपनी बेटी को शहर के उसी स्कूल में प्रवेश दिला दिया, जिसमें वह पढ़ाते थे। वे उसे अपने साथ साइकिल पर ले जाते और साथ वापस लाते। रास्ता तो एक ही था। मुलाकात भी होती, लेकिन कुछ ऐसे कि मैं धीरे-धीरे पैदल जा रहा होता और मेरे बाजू से मास्टर जी की साइकिल गुजर रही होती। पता नहीं वह मेरी ओर देखती या नहीं, लेकिन मैं उसकी ओर देखने का साहस नहीं जुटा पाता।
हम बड़े होते जा रहे थे। हमारे वयस्क होने के चिह्न उभरने लगे थे। आयु के इस मोड़ पर कभी हमारा सामना होता भी तो मेरे पैर कांपने लग जाते और वह लजा कर भाग जाती।
तब हमारे शहर में कॉलेज नहीं था। पिताजी ने आगे की पढाई के लिए मुझे महानगर में मामा के पास भेज दिया। पीछे मुड़ कर देखने का अवसर नहीं था, फिर भी कभी-कभार मुझे आज से मैं तेरी बन्नो वाली बात याद आती और मन में सिहरन का अनुभव होने लगता।
तीज-त्यौहार पर जब कभी गाँव आना-जाना होता तो आँखें अनायास उसे ढूंढने लगतीं। कभी आमना-सामना होता तो इस स्थिति में कि वह छत पर खड़ी होती और मैं गली में। हम एक-दूसरे को ठीक तरह से देख ही नहीं पाते क्योंकि यदा-कदा जब हमारी आँखें मिलतीं तो पल-दो पल में ही शर्म से झुक जातीं। हमारे संस्कार ही ऐसे थे और ऊपर से बड़े-बुजुर्गो का डर भी बना रहता था।
समय के साथ-साथ आयु में वर्ष जुड़ रहे थे, अतीत धुंधलाने लगा था। मैं वकालत कर रहा था, जज बनने के सपने मेरे मस्तिष्क में अपनी जड़ें गहरी बनाते जा रहे थे।
गर्मी की छुट्टियाँ हुई, हर बार की तरह इस बार भी मैं छुट्टियाँ बिताने गाँव आया। अब माता-पिताजी और घर के अलावा गाँव की अन्य चीजों से पहले जैसा लगाव बाकी नहीं रह गया था। घर पहुँचते ही पता चला कि उसकी शादी होने वाली है। जाने-अनजाने अन्तर्मन में कुछ टूटने की आवाज हुई और मैं यह समझ नहीं पाया कि ऐसा क्यों हुआ था।
उसके यहाँ शादी की तैयारियां जोर-शोर से चल रही थीं। मुझे भी जिम्मेदार व्यक्ति की तरह काम सौंपे गए थे, लिहाजा मन में खासा उत्साह था। सुबह से रात तक किसी न किसी काम में लगा रहता। धीरे-धीरे शादी का दिन आ गया। गाँव-कस्बे के बड़े-बुजुर्ग, मुखिया तो सुबह से ही आकर जम गए थे। उनके लिए लस्सी-पानी का प्रबंध करते रहना भी बड़ा काम था। ऊपर से साज-सजावट, शाम के भोज की व्यवस्था... दम मारने की फुरसत नहीं मिल पा रही थी।
दिन कब बीत गया, पता नहीं चला। अब तो बारात आने की बेला पास आ रही थी। स्त्रियां सज-संवर चुकी थीं। ऊपर के कमरे में उसे दुल्हन बनाया जा रहा था।
खूब चहल-पहल थी। मैं किन्हीं कामों में व्यस्त था कि तभी उसकी छोटी बहन आई, फुसफुसाते हुए बोली- दीदी आपको ऊपर कमरे में बुला रही है।
मैंने उस निर्देश को भी अन्य कामों की तरह ही लिया और सीधा ऊपर कमरे की ओर बढ़ चला।
कमरे का दरवाजा भिड़ा हुआ था और वहाँ उस समय कोई नहीं था। मैं आगे बढ़ा और तनिक सहमते हुए दरवाजा खोला। अंदर वह अकेली थी, लाल रंग की साड़ी और सुनहरे आभूषणों से सजी-संवरी वह एक ज्वाला की तरह लग रही थी। मुझे वह एक अभिसारिका की तरह आकुल व उत्कंठित प्रतीत हुई। जीवन का यह पहला अवसर था, जब मैं सजी-संवरी दुल्हन के इतने पास खड़ा था।
मैं निस्तब्ध था।
वह अचानक मेरे करीब आ गई। अब हम एक-दूसरे की तेज चलती सांसों की आहट सुन पा रहे थे। उसने मेरा हाथ पकड़ कर अपनी दोनों हथेलियों के बीच दबा लिया और बोली- कैसी लग रही है तुम्हारी बन्नो?
मैं चौंका, घबराया और लड़खड़ाते हुए बोला- सुंदर, बहुत सुंदर !
वह तपाक से बोली- तो अपनाया क्यों नहीं?
अपनी बात पूरी करते-करते उसका गला भर आया था।
मतलब? मैंने कहा।
मतलब क्या? भूल गए? मैंने कभी तुमसे वादा किया था कि मैं केवल तुम्हारी बन्नो बन कर रहूँगी। उसकी आवाज में अधीरता थी।
वे तो बचपन की बातें थीं, मैंने कहा।
तो वह बोली- जवानी बचपन से ही निकल कर आती है, आसमान से तो नहीं टपकती। बचपन के वादे जवानी में निभाने चाहिए या नहीं? बोलो?
मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था, चुप रहा।
वह फिर बोल उठी- मैंने तो बहुत प्रतीक्षा की। शायद कभी न कभी तुम कुछ कदम आगे बढ़ाओ, धीरे-धीरे मैं निराश हो गई। क्या करती, मैंने शादी के लिए हाँ कर दी।
मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहूँ !
लेकिन मुँह से निकला- अब क्या हो सकता है?
उत्तर में वह बोली- चलो भाग चलते हैं।
"धत्.. ऐसा कुछ नहीं हो सकता।" मेरे मुँह से अनायास ही निकला।
वह तनिक और आगे बढ़ आई और बोली- तुमसे कुछ नहीं हो सकता। पर मुझसे जो हो सकता वह तो मैं करूँगी।
वह मेरे और करीब आ गई और मुझे अपने बाहुपाश में जकड़ लिया।
हमारी सांसें तेज चल रही थीं।
उसकी उत्तेजना में..
तो मेरी घबराहट में।
वह किसी मदोन्मत्त की तरह मेरे आगोश में थी..
अब यह बखान करना तो बेमानी होगा कि उस समय जो कुछ हुआ वह क्या और कैसा था। किस कमबख्त को ऐसे पलों में होश रहता है। लेकिन मेरा पूरा शरीर आंधी में किसी पेड़ से लगे पत्ते की भान्ति कांप रहा था।
कोई देख न ले, यह शाश्वत भय न जाने कितने अवसर चूकने को मजबूर करता है।
मैंने धीरे से दरवाजा खोला और बाहर निकल गया।
अभी मैं छत से नीचे जाने वाली सीढ़ियों की ओर बढ़ रहा था कि किसी ने मजबूती से मेरा हाथ पकड़ लिया।
मैंने घबरा कर देखा तो वह भाभी थीं, सगी नहीं, परिवार-खानदान के रिश्ते वाली भाभी।
मेरी हमउम्र थीं और सच कहूँ तो वह हमारे परिवार की रौनक थीं।
मेरा हाथ पकड़े-पकड़े भाभी ने अपने आंचल से मेरे होंठ और गालों को रगड़ कर पौंछ डाला।
मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था और स्तब्ध खड़ा था।
आज पहली बार भाभी ऐसा कुछ करते हुए हंस नहीं रही थीं, वह गंभीर थीं, धीरे से बोलीं- लाली लगी थी, पौंछ दी है। इस हालत में नीचे जाते तो दोनों फांसी पर लटके मिलते।
मैं सिहर उठा। वक्त की नजाकत को समझने में मुझसे भूल हुई थी। यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं।
भाभी बोलीं- जाओ, भूल जाओ उसे।
इस वक्त एकाएक अपना कुछ खोने जैसी कसक दिल में चुभती सी महसूस हुई। आँखें नम हो आई।
फिर भी, मैंने खुद को निर्दोष साबित करने का प्रयास करते हुए कहा- वो अब तक बचपन की बातें सहेज कर बैठी है।
भाभी धीरे से बोलीं- होता है..। प्यार तो कच्ची उम्र में ही होता है।
कच्ची उम्र नहीं भाभी..! मैंने कहा- वो सब बचपन की बातें हैं।
वह बोलीं- तुम सचमुच भाग्यवान हो। कोई तुम्हें बचपन से प्यार करता है।
मैंने उनकी बात पर ध्यान न देते हुए अपने को तनिक व्यवस्थित किया और कहा- बिना सोचे समझे यह कर डाला।
भाभी ने गहरी सांस ली और बोली- जो नासमझी में हो जाए वही प्यार है। सोच-समझ कर तो सौदा किया जाता है।
भाभी जो कुछ भी कह रही थीं वह उनके चिर-परिचित स्वभाव के नितांत विपरीत था।
मुझे उनके स्वर में टीस का आभास हो रहा था, मैं खुद को रोक नहीं पाया और मैंने उनसे बिंदास प्रश्न किया- भाभी, आपके साथ भी कुछ ऐसा.. मेरा मतलब, कभी आपने भी किसी से.. मैं प्रश्न पूरा कर पाता उससे पहले भाभी नीचे जाने वाली सीढ़ियों की ओर जा चुकी थीं।
वह सीढ़ियाँ उतरते-उतरते बोलीं- स्त्रियाँ अपने विफल प्यार के किस्से नहीं सुनाया करतीं।
मैं अवाक खड़ा रह गया था।
बाजे की आवाज अब पास आती जा रही थी..

आकर्षण-5

आकर्षण-5

लेखिका : वृंदा
वेदांत मेरे पास आया.. उसने मुझे गले लगा लिया.. उसकी तरफ देख कर बोला... : दोस्त है यह मेरी, प्यार करता हूँ इससे.. हाथ तो क्या आँख भी उठाई ना.. तो उस दिन के बाद किसी और को नहीं देख पायेगा तू...!!!
मेरी आँखें भर आई थी... पर साथ साथ होंठों पर मुस्कान भी थी.. अजीब सा लग रहा था.. रो रही थी या हंस रही थी पता नहीं... मैं उसे बाहर ले आई.. अनिरुद्ध के घर वालों को फोन करके इत्तिला दी.. कि अनिरुद्ध का एक्सिडेंट हो गया है...
अनिरुद्ध के हाथ पाँव टूट चुके थे उस दिन के बाद तीन महीने तक वो कॉलेज़ नहीं आया...!!!
अब मेरे और वेदांत के रिश्ते में भी स्पष्टता आ गई... आखिर उसने अपने प्यार का इज़हार जो कर दिया था..
मुझे अब लगने लगा था जैसे मेरी मांगी मुराद पूरी हो गई.. मेरा एक तरफ़ा आकर्षण अब प्रेम का रूप ले जग जाहिर होने लगा था.. होंठों की मुस्कान रोके नहीं रूकती थी.. चेहरे पर असीमित शान्ति.. क्रोध राग द्वेष से कोसों दूर हो चुकी थी, सब कुछ अच्छा-अच्छा लगने लगा था.. पूरी दुनिया हसीं हो गई थी..
पर इन सब ख्वाबों में खोई मैं वेदांत को भी पल पल अपने से दूर कर रही थी.. मेरे अपने एक तरफ़ी प्रेम के बहाव में बहने से .. हम दोनों में वार्तालाप अब कम होने लगी.. घंटों तक उसे देखते रहना.. उसके ख्यालों में खोये रहना.. सोचते रहना.. कुछ भी न कहना .. खुद से बातें करना.. हमारे बीच आने लगा था.. मैं न चाहते हुए भी उससे दूर होने लगी थी... मेरा यह आकर्षण हमारी दोस्ती को दीमक की तरह चाट रहा था...
एक दिन ...
मेरा जन्मदिन था.. उसने मुझे स्कूल में विश भी नहीं किया.. कोई उपहार नहीं, कोई फूल भी नहीं.. मेरी तरफ देखा तक नहीं.. बात भी नहीं की उस खडूस ने..
बड़े ही बेमाने दिल से मैं स्कूल से आने के बाद सोने चली गई, मम्मी ने बाहर जाकर जन्मदिन मनाने के लिए भी कहा.. पर मेरा बिल्कुल मन नहीं था, मेरी ज़िन्दगी के सबसे महतवपूर्ण इंसान को कुछ फर्क नहीं पड़ रहा था कि मैं हूँ या नहीं.. उसके इज़हार के बाद उसका इतना रूखापन मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था... आँखों में आंसू भरे मैंने उसे एस.एम.एस. किया... "शायद आज तुम कुछ भूल गए... शायद आज हमारे बीच इतनी दूरियाँ आ गई हैं कि एक दूसरे की जिंदगी में क्या चल रहा है.. इस बात से तुम्हें कुछ फर्क नहीं पड़ता... तुम मेरे पहले और आखिरी दोस्त हो ! - वृंदा "
उसके जवाब के इंतज़ार में मैं कब रोते रोते सो गई मुझे पता ही नहीं चला...
रात के बारह बजे, तकिये के नीचे पड़े फोन से घू घू घू घू की आवाज़ आई.. अध्खुली, नींद भरी आँखों से मैंने फोन देखा.. लिखा था वन अनरेड मैसेज..
मैंने मैसेज पढ़ा... लिखा था,"मुझे माफ़ कर दो ! आज मैंने पूरा दिन तुमसे बात नहीं की... मैंने जानबूझ कर ऐसा किया, मैं तुम्हें तुम्हारे जन्मदिन पर एक तोहफा देना चाहता था.. जिसे मैं सिर्फ हम दोनों के बीच ही रखना चाहता था.. अपनी बेरुखी के लिए माफ़ी चाहता हूँ.. वादा करता हूँ कि आज के बाद ऐसा नहीं करूँगा.. तुम्हारा तोहफा लिए मैं नीचे तुम्हारे घर के बाहर खड़ा हूँ.. जल्दी से आ आकर ले लो, वरना मैं कभी खुद को माफ़ नहीं कर पाऊँगा...!!!"
इतना पढ़ते पढ़ते ही मेरी आँखों की नींद उड़ चुकी थी.. दिल जोरो से धक् धक् करने लगा था.. जाने क्या लाया होगा वो.. एक बड़ा सा टैडी बीयर, या फिर ग्रीटिंग कार्ड.. या चोकलेट...मेरे पेट में कुलबुलाहट सी होने लगी..
मैं अपनी छोटी सी निक्कर और टीशर्ट में ही नंगे पावों सीढ़ी से नीचे उतर कर दरवाज़े तक गई.. बहुत ही धीमे से मैंने दरवाजा खोला... ताकि कोई जाग न जाये.. जाने क्यों मुझे पकड़े जाने का डर लग रहा था.. पता नहीं मेरे मन में चोर अपने आप में ही भयभीत हो उठा... कहीं किसी को पता लग गया तो... कहीं अंकल या मम्मी पापा ने देख लिया तो.. किसी और ने देख लिया तो...!!! अजीब सी उधेड़बुन में मैंने दरवाजे की चिटकनी खोली..
सामने वो खड़ा था... उसके हाथ में कुछ नहीं था... मेरा चेहरा थोड़ा उदास जरूर हुआ पर उसे करीब देख कर फिर भी मन में संतुष्टि थी...
"कहाँ है मेरा तोहफा?" मैंने आंखें बंद कर उसके सामने हाथ बढ़ा दिया...
उसने मेरा हाथ हाथों में भर लिया.. धीरे से मुझे दीवार की ओर सरकाया .... मेरी आँखें तब भी बंद ही थी... हल्की हल्की चलती ठंडी हवाओं से मेरे खुले बाल मेरे गालों को छू कर होंठो से लिपटते जा रहे थे.. चाँद की चाँदनी में हम दोनों अकेले ... तन्हा... एक दूसरे के सामने.. और बेहद करीब थे... मैं उसकी सांसें सुन पा रही थी..
फिर धीरे से वो मेरे और करीब आया...उसने अपने दूसरे हाथ की उंगलियों से मेरे होंठों तक आती जुल्फों को मेरे कान के पीछे कर दिया..
मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था.. अब मुझे उसकी सांसें भी महसूस होने लगी थी.. मैं अपनी आँखें खोलने ही वाली थी.. फिर वो हुआ जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी..
हम दोनों का वो पहला चुम्बन.. जो शायद मेरे लिए बयां कर पाना भी बहुत मुश्किल है... शायद एक या फिर दो मिनट ही चला होगा... पर उस खूबसूरत एहसास को लिखना... उफ्फ्फ्फफ्फ़
हमारे चुम्बन के बीच जैसा सब कुछ रुक गया.. हवाएँ... समय... उड़ते बादल.. रात की रानी की महक... सब कुछ थम सा गया था.. और सिर्फ हम दोनों थे उस एक पल में.. एक दूसरे से जुड़े.. एक दूसरे से बंधे...एक दूसरे में खो जाने के लिए... उस एक गर्म चुम्बन से बहार की ठंडक भी गर्मी में बदल गई थी...फिर धीमे से हम दोनों जब अलग हुए.. और मैंने आंखें खोली..
उसने मुझे कहा,"यह था तुम्हारा जन्मदिन का तोहफा..." " जन्म रात बहुत बहुत मुबारक हो... "
कुछ देर तो मैं एकटक खड़ी सोचती रही.. यह क्या हुआ अभी कुछ देर पहले मेरे साथ...?
फिर अचानक उसके शब्द मेरे कानों में गूंजने लगे,"अन्दर नहीं बुलाओगी... अन्दर नहीं बुलाओगी क्या.. हेल्लो ! मुझे ठण्ड लग रही है..."
मैंने उसे घर के भीतर लिया उसने भी अपनी चप्पल हाथ में ले ली ताकि कोई आवाज़ ना हो..
मैंने चिटकनी लगाई और उसे फुसफुसाते हुए सीढ़ियों से ऊपर जाने का इशारा किया...
वो ऊपर चला गया.. और मैं अपनी ही सोच में डूबी थी.. भावनाओं के भंवर में फंसी .. जिसे शायद प्रेम कहते हैं...स्नानगृह की ओर बढ़ गई.. अपने बाल सँवारे, मुँह-हाथ धोए.. कपड़े बदले और इत्र लगा कर अपने कमरे में गई..
वो फोन की लाइट से मेरे कमरे में भ्रमण कर रहा था.. दीवार पर लगी मेरी तस्वीरें गौर से देख रहा था..
अचानक हुए मेरे आगमन से वो थोड़ा हैरान सा हो गया.. मेरे इत्र की खुशबू ने पूरे कमरे को महका सा दिया था..
मैंने उसे बैठने के लिए कहा..
वो बैठ गया..
एक अजीब सी खामोशी के बीच हमसे कुछ बोले नहीं बन रहा था..
" तुमने मुझे स्कूल में क्यों नहीं विश किया?"
"तुझे क्या लगता है, स्कूल में तुझे मैं ऐसे कर सकता था..?"
"तो तू कोई उपहार नहीं ला सकता था?"
"क्या इससे बेहतर कोई और उपहार हो सकता था तेरे लिए.. तू ही बता..."
"तुझे यह खुराफाती आईडिया कैसे आया.?"
"चाहे खुराफाती भले था.. तुझे अच्छा लगा या नहीं..?"
अब मैं हाँ बोलती तो फंसती, ना बोलती तो झूठ होता.. वो हमेशा ऐसे टेढ़े सवाल करके मुझे फंसाता था..
"मेरी छोड़ तू अपनी बता.." मैंने भी बात घुमाई...
"अपनी क्या बताऊँ... मेरी तो दुनिया तुझ से ही शुरू है और तुझी पे ख़त्म.."
मुझे उसकी हर बात पर शर्म आ रही थी.. वैसे तो वो कई बार मेरे घर आया था.. मेरे कमरे में भी, पर आज कुछ अलग बात थी.. अलग कुछ ख़ास था.. आज वो एक अजनबी सा लग रहा था.. जैसे वो अब दोस्त नहीं रह गया था.. और वो उसकी चोर नज़रें मेरे दिल में गड़ी जा रहीं थी .. और उसका मेरी तस्वीरों को निहारना.. और मुझे देखकर चौंकना.. उसके दिल में जरूर कोई चोर था.. जिसे वो अपनी बातों से छिपा रहा था...
"अच्छा सुन... तूने यही वक़्त क्यों चुना..?"
" क्यूंकि ........" उसके पास कोई जवाब नहीं था..
फिर थोड़ी देर चुप रहने के बाद बोला..." तू सवाल बहुत करती है.. अब अगला सवाल किया तो तेरा मुँह बंद कर दूंगा.."
"अच्छा..!!! करके तो दिखा जरा ....!!!! काट खाऊँगी तुझे..!!!"
" यह बात.. !!!"
वो आगे बड़ा मुझे अपनी बाँहों में खींचते हुए उसने मेरा ज़ोरदार चुम्बन लिया.. काफी देर मेरे होंठ चूस चूस के लाल कर देने के बाद अपना चेहरा हटा के बोला.. " अब करेगी और सवाल .. करेगी अब..??"
"हाँ...करुँगी .. करुँगी.."
उसने फिर मेरे होंठों से अपने होंठ लगा दिए.. मैं भी अब उसके होंठ का मज़ा लेने लगी थी... उसके हाथ मेरी कमर नाप रहे थे.. और मेरे हाथ उसके बाल संवार रहे थे.. हम दोनों आंखें बंद किये.. एक दूसरे के होंठों को चूसते रहे.. उसकी जीभ अब मेरे होंठों को भिगोने लगी थी... उसकी आँखों में अब भी शरारत थी... होंठों के रसपान के बाद वो मेरी गर्दन की ओर बढ़ गया.. और गर्दन पर तो उसने अपने दांत ही गड़ा दिए.. उसके इस प्रेम पर तो मैं सौ जहाँ लुटा देती... मैंने उसके कानों पर जीभ फिरानी शुरू कर दी.... और कब उसके हाथ मेरी कमर से मेरे स्तनों तक पहुँचकर मेरे स्तन मसलने लगे, मुझे पता ही नहीं चला...
वो बार बार अपने होंठ मेरी टीशर्ट के ऊपर ले जा कर मेरे स्तनों के चूचक चूसता और फिर होंठ चूसता... ऐसा लग रहा था... जैसे होंठों की मिठास से मेरे चुचूकों के दूध को मीठा करके पी रहा हो...!!!
थूक से गीली हुई सफ़ेद टीशर्ट में से भूरे चुचूक अब दिखने लगे थे.. और मैं अब उसे खुद से दूर करने में लगी थी... पर उसकी हर छुअन मुझे अच्छी लग रही थी.. मैं किसी तरह उसकी बलिष्ठ बाँहों से छूटी.. और अलग हो गई... हम दोनों एक दूसरे की आँखों से एक दूसरे का मन पढ़ रहे थे...!!!
पढ़ते रहिए !

आकर्षण- 6

आकर्षण- 6

लेखिका : वृंदा
मुझे अपने टांगों के बीच कुछ रिसता हुआ सा महसूस हो रहा था... मेरी अन्तर्वासना मुझे सारी हदें भूल जाने को कह रही थी.. मैं इसी उधेड़बुन में थी कि तभी वो आगे बढ़ा, उसने मुझे बिस्तर पर धकेल दिया और मेरे ऊपर चढ़कर.. मुझे ज़ोरदार चुम्बन करने लगा..
मैं उसके होंठों के रस में डूब जाना चाहती थी.. उसने मेरी टीशर्ट के अन्दर हाथ डाल दिए... और मेरे चूचे मसलने लगा .. मेरी आनन्द से भरी सीत्कारें कमरे के माहौल को और कामुक बनाने लगी... मेरा हाथ खुद ब खुद उसके बलिष्ठ शरीर से फिसलता हुआ उसके कूल्हों पर जा पहुँचा ... मैं उसकी गोलाइयाँ मसलने लगी...
"अच्छा जी...!!! यह बात ..? हिम्मत है तो इसे मसल कर दिखा.." कहते हुए उसने मेरा हाथ उसके पायजामे में छिपे कड़क लण्ड पर रख दिया..!!!"
हम दोनों ही यौवन की काम क्रीड़ाओं में सारे संसार को भूल चुके थे...
मैं धीरे धीरे उसका लण्ड सहलाने लगी... और अब वो जोर जोर से मेरी अमरुद जैसी चूचियों को अपने हथेलियों के भीतर कुचल रहा था... साथ ही साथ उसके होंठ मेरी सीत्कारों को बंद करने के लिए मेरे होंठो को बार बार चूमते, उसकी जुबान मेरी जुबान से टकराती और फिर दौर शुरू हो जाता एक लम्बे चुम्बन का....!!!
फिर उसने एक हाथ मेरे चूचों से हटा कर मेरी निक्कर में घुसा दिया.. उसके आशा के विपरीत मैंने भीतर कुछ नहीं पहना था.. मेरे चूत की बाल घने घुंघराले और काले हैं... वो.. उस घने जंगले में पानी का स्रोत ढूंढने लगा... मेरी चूत को अपनी हथेलियों में भरकर उसने दबा दिया..
मेरी तो आह ही निकल गई...
उसकी एक ऊँगली मेरी चूत में भ्रमण कर रही थी !
उसने उस स्थान के गीलेपन को छुआ और ऊँगली बाहर निकाल ली... उसे सूंघते हुए... उसने मेरी ऊँगली चाट ली...!!!
अब उसने मेरी टीशर्ट उतार फेंकी और अपने मुँह मेरी चूचियों में दे दिया... मेरे होंठों को हाथों से दबा दिया.. और फिर मुझे मेरी टांगों के बीच एक मचलता सा हाथ महसूस हुआ.. और...
आआह्ह्ह आआअह्ह ... वो मेरी चूत में दो ऊँगली डाल आगे पीछे करने लगा.. तब तक में भी उसके पयजामे से उसका लण्ड बाहर निकाल चुकी थी... वो मुझे अपनी उंगलियों से काफी देर तक तड़पाता रहा... कभी अन्दर डालकर घुमा देता.. कभी दाना दबाता... मेरी फ़ांकें खोल कर उसमें गिटार बजाता...
मैं बस अपनी आँखें बंद कर अपने जिस्म के मज़े ले रही थी...
कि तभी वो मेरे ऊपर से हट गया...!!!
" क्या हुआ.. हट क्यों गए..?... " एकाएक मैंने आँख खोल कर देखा...
वो मेरे सामने खड़ा था उसका लंड हवा में तना हुआ... और मैं अधनंगी उसके सामने लेटी हुई थी... मेरे चमकते जिस्म की चमक उसकी आँखों में देख सकती थी... मेरी निक्कर आधी नीचे उतर चुकी थी.. मेरे इस सवाल पर उसने मुझे टांगों से अपनी और खींचा और मेरी निक्कर उतार फेंकी... अपनी लंड हाथ में लिए वो वो मेरी चूत को और तड़पाने लगा.... उसने फिर से मेरी चूत में ऊँगली कर दी.. और अबकी बार तीन उंगलियाँ घुसा दी.. फिर निकाल कर मेरे मुँह में दे दी...
मैंने मना किया...
"देख तुझे इस सब में मज़ा आया न.. तो यकीन रख, इसमें भी आएगा...ले चूस इसे.."
मैंने उसकी उँगलियाँ मुँह में डाली.. खट्टी खट्टी थीं...
अब वो मेरे ऊपर उल्टा होकर लेट गया... उसकी टांगें मेरे मुँह की तरफ थी.. अब वो फिर मेरी चूत में उँगलियाँ करने लगा... और मुझे अपना लण्ड चूसने पर मजबूर करने लगा...
"विश्वास रख .. शुरू शुरू में मानता हूँ, अच्छा नहीं लगेगा.. पर तू चूसना मत.. बस होंठों से लगाना.. जैसे मुझे प्यार करती हो .. इस छोटे वेदांत को भी प्यार करना....!!!"
मैं वासना में डूबी उसकी हर बात मानती चली गई....अब तो ना वो बर्दाश्त कर पा रहा था न मैं... मैं जल्द से जल्द कुछ कर गुज़ारना चाहती थी... अपना सब कुछ उसे सौंप कर हमेशा के लिए उसकी हो जाना चाहती थी..
काफी देर मेरी मेरी चूत में ऊँगली करने के बाद उसने मेरी चूत पर जीभ लगा दी... और मेरी गांड में ऊँगली करने लगा... मैं चुदने के लिए तड़पने लगी।
अब मेरी ऐसी हालत हो गई कि वेदांत के अलावा अगर और कोई भी आ जाता तो तो उसके कपडे फाड़कर मैं उसके लण्ड पर बैठकर उसे चोद देती... मैं अपने बस में नहीं थी... मैं किसी भी तरह लण्ड लेने के लिए तैयार थी... मेरी चूत रस छोड़ छोड़ कर एक तालाब बन चुकी थी... काम-रस चूत से बहता हुआ हर जगह जा पहुँचा था.. गाण्ड पर.. बिस्तर पर... जांघों पर... मैं बुरी तरह प्यासी थी... मेरी अन्तर्वासना पूर्ण जागृत हो चुकी थी... और मर्दाने जिस्म की चाहत... जो सिर्फ एक लण्ड से बुझ सकती थी....
मैं जंगली बिल्ली की तरह अब उसे नोचने लगी थी... उसने मेरी चूत को छोड़ा और खड़े होकर मेरी चूत में लण्ड फ़ंसाने लगा... लंड घुस तो गया था पर.. अन्दर नहीं जा पा रहा था.. आखिर लण्ड और उंगलियों में कुछ तो फर्क होगा, तभी तो सब औरतें लण्ड की दीवानी होती हैं... वरना उँगलियाँ तो औरतों के पास भी हैं...!!!
मैंने उसे कहा- तुम लेट जाओ.. अब मैं तुम्हे मज़ा दूंगी..
"मेरी जान चाहे मैं लेटूँ या तुम.. चुदोगी तो तुम ही... चाहे खरबूजा चाकू पर गिरे.. या चाकू खरबूजे पर कटता तो खरबूजा ही है ना...उसी तरह फटती तो चूत ही है ना..."
मैंने उसे गाली दी.. साले हरामी ! तुझमें चोदने का दम होता तो अब तक उंगली ना कर रहा होता.. मेरी चूत इतनी गीली है कि किसी बुड्ढे का लण्ड भी फुफकारने लगे..."
"अच्छा मेरी जान ?"
कह कर वो पलंग पर लेट गया...
मैं उछल कर उसके ऊपर टागें खोल कर बैठने लगी। 5-6 मिनट की कोशिश के बाद उसका लण्ड धीरे से मेरी चूत में घुस गया... मेरी आँखें काम-सुख से बंद होने लगी.. और अचानक से उसने मुझे नीचे से झटका दिया... और और उसने धक्के लगाने शुरू कर दिए...
उसने मेरे दर्द की तनिक भी परवाह नहीं की...
बल्कि वो मेरा दर्द भरा चेहरा देख और कामोत्तेजित हो उठ रहा था..
वह मेरे चूचों का मर्दन करने लगा... चूत का दाना बीच बीच में सहलाने लगता !
अब वो अचानक से पलटा और मेरे ऊपर आकर मेरी चूत पर अपने लण्ड का हक़ साबित करने लगा.. जितना उसमें दम था.. सारा एक जुट कर मेरी चूत मारने लगा..
मैं आनंदित हुई आंखें बंद कर मज़ा लेने लगी.. बीच बीच में मैं उसके होंठ अपने चूचों और अपने गालों पर महसूस करती...
बीच बीच में वो मुझे प्रेम भरे चुम्बन देता... धीरे धीरे उसके धक्के तेज़ होने लगे ... चूत में मुझे खिंचाव महसूस होने लगा... खुद ब खुद मैं उसके धक्कों से ताल से ताल मिला कर... उसका ज्यादा से ज्यादा लण्ड अपने भीतर लेने की कोशिश करने लगी... मेरी कोमल काया, उसके पसीने से भरे बलिष्ठ शरीर के नीचे दबी हुई कसमसा रही थी.. आनन्द अब अपनी चरम सीमा तक पहुँच रहा था..
एक झटके से जाने क्या हुआ मुझे अपनी दोनों जांघों के बीच कुछ गर्म-गर्म रिसता हुआ सा महसूस हुआ...
... मेरे मुँह से आनन्द भरी आहें निकलने लगी... बंद आँखें जब खुली तो वो मेरे ऊपर था और लम्बी लम्बी सांसें ले रहा था...
उसकी गर्म-गर्म सांसें मेरे पसीने से गीले बदन को ठंडक पहुँचा रहीं थी...
मैंने उसे उसकी गर्दन पर एक चुम्बन किया... और कुछ देर हम उसी तरह लेटे रहे...
कुछ देर बाद .. सामान्य अवस्था में आने पर वेदांत मुझ पर से हट कर मेरे साथ में लेट गया...
हम दोनों ने एक दूसरे को देखा और जोर जोर से हंसने लगे... यह सोचकर कि यह क्या हो गया.. एक चुम्बन ने क्या कर दिया... या फिर शायद यह यौवन ही था जिसने यह सब करा दिया...
मैं उसकी ओर थोड़ी टेढ़ी होकर लेट गई.. और उससे अपने प्यार का इजहार किया...
" वेदांत, एक बात कहूँ...?"
"फिर से करने का इरादा है क्या...?"
"नहीं वो... मतलब हाँ.. मेरा मतलब .. नहीं..." अचानक ही मुझे शब्दावली में शब्द कम होते महसूस हुए।
"क्या नहीं.. हाँ.."
मैंने आंखें बंद कर ली और कह डाला,"आई लव यू !"
और उसने बहुत ही सहजता से जवाब दिया,"मैं भी !"
और इस बार मैंने पहला कदम उठाया.. और उसे एक चुम्बन दिया.. मैं बहुत खुश थी.. कम से कम मैंने अपना सब उसे सौंपा, जिससे मैं प्रेम करती हूँ और जो मुझ से प्रेम करता है.. अब आगे कुछ भी हो.. मुझे किसी बात का डर नहीं था... मुझे किसी बात की परवाह नहीं थी.. उसे ही अपनी मंजिल मान चुकी थी मैं...
यह भाग समाप्त..
क्या वो सच मच प्रेम था.. या केवल एक रात की आग ... क्या उसने मेरा फायदा उठा कर मेरे मासूम प्रेम को ठगा था.. या यह सब कुछ सोच-समझ कर की गई मेरे खिलाफ एक साजिश थी..
जानने के लिए पढ़ते रहिये आकर्षण.. केवल अंतिम भाग शेष ..!!!

आकर्षण-3

आकर्षण-3

लेखिका : वृन्दा
बस इसी तरह समय बीतता रहा.. हम समय के साथ बड़े हो रहे थे.. हम दोनों ही यौवन द्वार पर खड़े थे... वो दिन मेरे लिए बेहद कठिन था.. मेरे जीवन की पहली माहवारी..
सुबह से ही टांगों और पेट में दर्द हो रहा था.. जैसे कोई आरी से काट रहा हो... मुझे लगा शायद पेट ख़राब है और टांगों में ज्यादा चलने-भागने की थकान से हो रहा होगा .. मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया...
हमारे स्कूल में हरे रंग की स्कर्ट्स हुआ करती थी...
लंच में जब हाल में हम दोनों मिले .. तब तक मेरी हालत और भी ख़राब हो चुकी थी.. मेरे से बैठा भी नहीं जा रहा था... उसके बहुत बार कहने के बाद मैंने कुछ निवाले खाए... फिर मुझे अजीब सा कुछ महसूस हुआ .. जैसे टांगों के बीच से कुछ रिस रहा हो.. कैसे बताऊँ वो भावना व्यक्त कर पाना बहुत मुश्किल है.. सोचते हुए ही घिन्न सी आती है.. उलटी सी...
खैर कुछ ही देर में मेरी स्कर्ट भी गीली होने लगी.. काले काले धब्बे दिखने लगे.. मैं दोड़ कर शौचालय गई..
कपड़े उतारते ही मेरा तो हाल-बेहाल हो गया... चोट कहीं दिख नहीं रही थी और खून था कि बहे जा रहा था, बहे जा रहा था... टोयलेट पेपर से जहाँ तक हो सका साफ़ करती रही...पर टोयलेट पेपर भी ख़त्म हो गया... इतने में कुछ बड़ी क्लास की लड़कियाँ वहाँ आईं .. मैंने उन्हें अपनी पूरी दुविधा बताई.. और जल्द से जल्द डाक्टरी सहायता लाने को कहा...
वो सभी मुझ पे हंसने लगीं... और बोलीं..: अरे डरने की बात नहीं.. यह सभी के साथ होता है.. तेरे पास कोई कपड़ा या कुछ नीचे लगाने को नहीं है क्या..??
मैं : नहीं..!!!
लड़कियाँ : बाहर तेरा यार खड़ा है, उससे मांग ले..
वेदांत बहार खड़ा है सुन.. मुझे और डर लगने लगा...
मैं बाहर जाने लगी.. पीछे से आवाज़ आई..
लड़कियाँ : अच्छा सुन.. किसी को बताइयो मत खून आ रहा है तेरे...वरना बेकार में इसी उम्र में लुट जाएगी..
यह कहकर वो खिलखिला मेरा बेबसी पर हंसने लगी..!!!
मैं : अच्छा ठीक है....
सर्दियो का मौसम था.. मैंने स्वेटर उतार कमर पर बांध लिया..
बाहर पहुँची..
वेदांत मुझे देखते ही भड़का..: स्वेटर क्यों उतार दिया.. ?
मैं : मुझे गर्मी लग रही है.. तेरे पास रुमाल है क्या..?
वेदांत : रुमाल ??? क्यों चाहिए ??.. अब रुमाल का क्या करेगी..??
मैं : तू दे रहा है या नहीं.. ...?? दे ना, परेशां मत कर.. बाद में बताऊँगी ...!!
मुझे उसके सवाल बहुत परेशान कर रहे थे..खैर.. रुमाल ले जल्दी से वापिस अंदर गई.. सेट करके रुमाल लगा तो साँस आई...
बाहर आई..
वेदांत : रुमाल दे..!!!
मैं : रुमाल...??? वो तो गलती से टोयलेट में ही गिर गया...
सॉरी..
लंच के बाद एक पिरीयड ख़तम हो चुका था.. हम दोनों अपनी अपनी कक्षा में जा बैठे.. और घर लौटते वक़्त भी कुछ ज्यादा ख़ास बात नहीं हुई.. वो पूछता रहा, मैं टालती रही..
क्या बोलती उसे.. मेरी योनि जख्मी हो गई है...??? मैं असमंजस में थी, घर पहुँच कर मम्मी को बताऊँ या नहीं.. फिर मम्मी ने मेरी स्कर्ट देख ली..और शुरू उनके सवालों की झड़ी...
यह क्या है.. तुझे खून निकल रहा है, तूने बताया क्यों नहीं.. किसी और को तो नहीं बताया.. किसी को पता तो नहीं चला.. हे भगवान एक ही सांस में सारे सवाल पूछ डाले मम्मी ने.. !!!
मैं : नहीं...!!!!
मम्मी : सुन अब यह मुसीबत शुरू हो गई है, इसे माहवारी कहते हैं ... अब तुझे.. हर महीने ऐसा होगा.. और जब जब होगा, तुझे कोई कपडा या कोई नैपकिन इस्तेमाल करना है.. वो टीवी में देखती है न विस्पर जैसा .. वैसा कुछ... किसी लड़के को इसके बारे में नहीं बताना... उस जगह पे किसी को हाथ या और कुछ भी नहीं लगाने देना... और जब कभी किसी महीने माहवारी न हो तो सीधे मुझे आकर बताना..
मैं हाँ में सर हिलाती रही.. पर मम्मी का लेक्चर अभी भी चालू था...!!
और अगर कभी ज्यादा रिसाव हो तो सावधान रहना कि कपड़े गंदे न होने पाएँ... और खून देख कर घबराना नहीं.. जैसे ही नैपकिन भर जाये उसे बदलती रहना.. अक्सर ऐसे में रशेज़ या दाने और खुजली जैसी परेशानियाँ होती हैं इसीलिए वो जगह हमेशा साफ़ रखना.. बाल ट्रिम करती रहना..!!! समझ भी आ रही है या ऐसे ही हवा में सर हिला रही है..!?
मैं : आपको कैसे पता कि मेरे वहाँ बाल हैं...???
मम्मी : मेरे भी हैं... सभी के होते हैं...!!!
मैं : पर आप तो वहाँ कंघी नहीं करती...???
मम्मी : तू कंघी करती है क्या..??? अरे वहाँ कंघी नहीं करते...!!!
मैं : तो बाल उलझते नहीं हैं क्या..!!!
मम्मी : अरे इसीलिए तो ट्रिम करते रहते हैं.. हे भगवान् यह लड़की कब समझेगी ये सब बातें.. अब ज्यादा सवाल जवाब मत कर जा.. मेरी अलमारी में एक काली थैली पड़ी है, उसमें तेरे काम की एक चीज़ है उसे अपनी एक साफ़ सुथरी धुली हुई कच्छी पर लगा और पहन ले.. और तुरंत अपने गन्दी कच्छी धो ले और स्कर्ट भी वरना निशान जायेंगे...!!!
मेरे लिए तो एक और आफत आ गई.. अब इस चक्कर में कपड़े भी धोवो...
मैंने तो अपना पहला चरण यौवन द्वार पर रख दिया था.. शायद लड़कों में भी कुछ ऐसा ही होता होगा.. वो मुझे आज तक पता नहीं चला कि जब लड़के युवा होते हैं तो उनके साथ क्या विचित्र होता है...???
खैर.. अब धीरे धीरे मेरे शरीर में भी बदलाव होने लगे.. झांघें जो पहले तिलियों सी पतली थी अब थोड़ी भर गई.. ऊपरी हिस्से में भी काफी बदलाव हुए... छाती.. स्तनों के रूप में उभरने लगी.. एक गोल्फ बाल जितना आकार लेने लगी... और मैं खुद को अच्छी लगने लगी.. घर में ज्यादातर समय शीशे के सामने गुजरने लगा.. बालो को बिखेरना... फिर संवारना... लटों को कभी गालों पे झुलाना कभी आँखों पर घुमाना..
अपने पुराने छोटे हुए कपड़े फिर से पहन कर देखना.. तंग होती टी-शर्ट और घुटनों से ऊपर आती निक्कर.. मुझे वो सब पहनना अच्छा लगने लगा.. मेरी लम्बाई भी अब ५ फुट ४ इंच हो चली थी.. और वेदान्त तो पहले ही लम्बा हो हो के ऊँट बन गया था...
यौवन का यह बदलाव बेहद सुखद था.. तन और मन में आते बदलाव, कुछ कुछ होने जैसी अनुभूति होती थी चेहरे पे सदा रहने वाली मुस्कान.. लड़कों की मेरे स्तनों पर पड़ती तिरछी निगाहें अब मैं भांपना सीख गई थी... छेड़-छाड़ भी आम सी बात हो गई थी..!!!
पर क्या मेरे जिस्म में आते बदलावों को वेदान्त ने भी महसूस किया.. क्या उसमें भी मेरे प्रति आकर्षण जागृत हुआ.. आगे क्या हुआ जानने के लिए पढ़ते रहिये आकर्षण..
तीसरा भाग समाप्त

आकर्षण-4

आकर्षण-4

लेखिका : वृन्दा
अब धीरे धीरे मेरे शरीर में भी बदलाव होने लगे.. झांघें जो पहले तिलियों सी पतली थी अब थोड़ी भर गई.. ऊपरी हिस्से में भी काफी बदलाव हुए... छाती.. स्तनों के रूप में उभरने लगी.. एक गोल्फ बाल जितना आकार लेने लगी... और मैं खुद को अच्छी लगने लगी.. घर में ज्यादातर समय शीशे के सामने गुजरने लगा.. बालो को बिखेरना... फिर संवारना... लटों को कभी गालों पे झुलाना कभी आँखों पर घुमाना..
अपने पुराने छोटे हुए कपड़े फिर से पहन कर देखना.. तंग होती टी-शर्ट और घुटनों से ऊपर आती निक्कर.. मुझे वो सब पहनना अच्छा लगने लगा.. मेरी लम्बाई भी अब ५ फुट ४ इंच हो चली थी.. और वेदान्त तो पहले ही लम्बा हो हो के ऊँट बन गया था...
यौवन का यह बदलाव बेहद सुखद था.. तन और मन में आते बदलाव, कुछ कुछ होने जैसी अनुभूति होती थी चेहरे पे सदा रहने वाली मुस्कान.. लड़कों की मेरे स्तनों पर पड़ती तिरछी निगाहें अब मैं भांपना सीख गई थी... छेड़-छाड़ भी आम सी बात हो गई थी..!!!
गर्मियों की छुट्टियाँ चल रही थीं.. मैंने तैराकी सीखने का मन बनाया और वेदांत ने कराटे... उसका कराटे सीखने का शौक तो एक ही हफ्ते में फुस्स हो गया.. पर मेरा तैराकी में खूब मन लग रहा था... हमारा तैराकी का शिक्षक बहुत गठीला और स्मार्ट था.... वो मुझ पर नज़र रखता था.. पर मैं उस पर नहीं, वेदांत पर लाइन मारती थी... वेदांत मुझे रोज़ शाम को वहाँ से लेने आता ! इस तरह हम दोनों को साथ समय बिताने का भी वक़्त मिल जाता था...
हम दोनों के बीच हाथ पकड़ना .. गले लगना आम बात थी. गालों पर चुम्बन भी अब आम ही हो चला था.. खैर जैसे कैसे एक दूसरे से अलग रह कर छुट्टियाँ ख़त्म हुई.. मैंने अपने कॉलेज़ की बास्केट बाल टीम में भाग ले लिया.. मैं लड़कियों में काफी लम्बी थी... कॉलेज़ के बाद अभयास भी करना होता था.. ऐसे में मैं वेदांत पर ध्यान नहीं दे पा रही थी.. उससे बात होना अब कम हो गया था.. पर वो पहला आकर्षण ! उसकी चिंगारी अब तक दिल में धधक रही थी...
एक दिन दोपहर को.. कॉलेज़ में मैं किसी प्राध्यापिका के पास जा रही थी.. रास्ता खेल के मैदान से होकर गुज़रता था.. जहाँ लड़कों की बास्केटबाल टीम अभ्यास कर रही थी... मुझे अनिरुद्ध ने आवाज़ लगाई ...
अनिरुद्ध लड़कों की टीम का कप्तान था..
अनिरुद्ध : वृंदा आओ, तुम भी खेलो हमारे साथ... !!
मैं : नहीं ! मुझे रीवा मैडम ने बुलाया है... बाद में आती हूँ...!!!
अनिरुद्ध ने बास्केट बाल मेरे पीछे मारते हुए कहा : क्यों हिम्मत नहीं है क्या....?
मैंने जवाब में बास्केट बाल लेकर उछाली और गोल कर दिया...!!! दूर से वेदांत यह सब देख रहा था.. भले ही उसे कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा था..!!!
जब से हम दोनों के बीच बात कम होने लगी.. हम दोनों बस एक दूसरे को दूर से ही देख कर संतुष्ट हो लिया करते थे...!!!
अगली क्लास में मेरे पास एक कॉपी आई उसमें लिखा था- अभी इसी वक़्त हॉल में आकर मिलो.. - नीचे अंग्रेजी का वी बना था..
मैंने अध्यापिका से पानी पीने जाने की इजाज़त मांगी और हाल की तरफ गई..
वो हाल में आगबबूला हो मेरा इन्तजार कर रहा था... उसकी अधीरता उसके एक दिशा से दूसरी दिशा तक चलने से पता लग रही थी....
पहुँचते ही..
मैं : क्या हुआ..??
वेदांत ने मेरी तरफ गुस्से से देखा.. उसकी आँखों में खून उतर आया था...
मैं : हुआ क्या है? बोलेगा..??
वेदांत : उस चूतिये अनिरुद्ध ने वह क्या किया..??
मैं : गाली मत दे मेरे सामने...उसने जो किया उसका जवाब भी मैंने उसे दे दिया...
वेदांत : क्या जवाब दिया तूने वो मैंने भी देखा.. उसने जो तुझे गलत जगह बाल मारी उसका क्या..?? मैं उसके हाथ तोड़ दूँगा उस कमीने हरामजादे के...!!! जो बाल उसने मार कर दिखाई है न.. उसी की गाण्ड में न घुसाई तो में भी वेदांत नहीं...!!! बहन का लण्ड.. मादरचोद.. साला...
वो अभी भी इधर से उधर, उधर से इधर टहले जा रहा था... और मुझे ये समझ नहीं आ रहा था कि ये लड़के लोग इतनी गालियाँ सीखते कहाँ से हैं... हमें तो कोई नहीं सिखाता...!!!
मैं : एक बात बता तू ! क्यों इतना भड़क रहा है.. तू क्यों इतना गुस्सा हो रहा है....??? तू दोस्त ही है न मेरा..इस से ज्यादा तो कुछ नहीं है... तो फिर इतनी बेचैनी क्यों.. किस लिए..??
वेदांत : मैं.... मैं... वो...
थोड़ी देर रुकने के बाद.. अच्छा चल ठीक है मैं सिर्फ तेरा दोस्त सही... उसके कमीने की हिम्मत कैसे हुई मेरी जान से भी प्यारी दोस्त को बाल मारने की.. कभी अपनी बहन के भी मारी है उसने बाल.. गांडू.. साला!!!
बस गालियों की बरसात हुए जा रही थी...!!!! और मैं सुने जा रही थी.. उसका गुस्सा ठंडा ही नहीं हो रहा था...!!!
उसकी माँ चोदूँगा न तब साले को पता चलेगा गाण्ड में डंडा कैसे किया जाता है...बहुत स्याना बनता है.. कहता है.. तुझे चोदेगा... उसकी माँ बहन एक कर दूँगा मैं.... साला पड़ोसी की औलाद...उसके बाप के टट्टे उसकी माँ की चूत में घुसे तब यह टट्टेबाज़ पैदा हुआ था..
मेरा दिमाग खराब होने लगा था.. पता नहीं कौन-कौन सी गालियाँ बोली उसने.. मुझे तो सारी याद भी नहीं..
खैर मुझे बीच में झल्ला के बोलना ही पड़ा : तू थोड़ी देर शांत होयेगा... चल तुझे जो भड़ास निकालनी है छुट्टी के समय निकाल लियो.. चल अभी पानी पीने चल... जो करना है कर लियो लेकिन अभी नहीं शाम को छुट्टी के बाद.. ठीक है चल अब कक्षा में जा..
वेदांत : तू जा कक्षा में.. मैं इसकी आज इसकी बजा के रहूँगा...!!!
मैं वहाँ से चली आई.. कक्षा में भी मेरा ध्यान वहीं था वेदांत पर...!!! जाने आज वो क्या कर बैठेगा... कहीं अनिरुद्ध को मार ही ना डाले...!!!
छुट्टी के समय मैं कॉलेज़ के द्वार पर खड़ी उसका इंतज़ार कर रही थी... कि तभी छात्रों की निकलती भीड़ में से एक लड़का जोर से भागता हुआ बाहर निकला... वो अनिरुद्ध था....उसके पीछे पीछे वेदांत भी हाथ में बैट लिए उसके पीछे दौड़ा... मैं भी उनके पीछे गई.. मेरे अन्दर उनके जितनी भागने की क्षमता तो नहीं थी.. पर फिर भी मैं उनसे इतनी दूरी पर थी की उनकी क्रियाएँ देख सकूँ... वो दोनों पास वाले बगीचे में घुस गए कुछ देर बाद मैं भी वहाँ पहुँच गई..
वेदांत अनिरुद्ध को धड़ाधड़ मारे जा रहा था.. और गन्दी गन्दी गालियाँ दे रहा था...
वेदांत : वृंदा को चोदेगा तू.. हैं...? ले चोद वृंदा को.. ले.. ..!!!
अनिरुद्ध अधमरा सा उसकी लातें घूंसे खा रहा था.. पास ही टूटा हुआ बैट पड़ा था..उस पर अनिरुद्ध का खून लगा था..!!!
वेदांत : हरामी.. साले कभी अपनी माँ को भी चोदा है तूने.. मेरी जान को चोदेगा... तेरी बहन को सड़क पे नंगा करके नीलाम कर दूँगा.. अगर आगे से वृंदा के आस पास भी फटका तो...
उसे अनिरुद्ध पर जरा भी तरस नहीं आ रहा था... मैं उसका हाथ खींच कर बाहर ले जाने लगी..
हाथ छुड़ा कर वो वापिस गया और एक लात और उसे मारी और बोला.. याद रखियो आज की तेरी चुदाई.. ऐसा ना हो कल को मुझे तेरी गाण्ड फिर से बजानी पड़े...!!
मैंने गुस्से से वेदांत को आवाज़ लगाई...: अब छोड़ेगा उसे...??
वेदांत मेरे पास आया.. उसने मुझे गले लगा लिया.. उसकी तरफ देख कर बोला... : दोस्त है यह मेरी, प्यार करता हूँ इससे.. हाथ तो क्या आँख भी उठाई ना.. तो उस दिन के बाद किसी और को नहीं देख पायेगा तू...!!!
मेरी आँखें भर आई थी... पर साथ साथ होंठों पर मुस्कान भी थी.. अजीब सा लग रहा था.. रो रही थी या हंस रही थी पता नहीं... मैं उसे बाहर ले आई.. अनिरुद्ध के घर वालो को फोन करके इत्तिला दी.. कि अनिरुद्ध का एक्सिडेंट हो गया है...
अनिरुद्ध के हाथ पाँव टूट चुके थे उस दिन के बाद तीन महीने तक वो कॉलेज़ नहीं आया...!!!
अब मेरा और वेदांत के रिश्ते में भी स्पष्टता आ गई... आखिर उसने अपने प्यार का इज़हार जो कर दिया था..
चौथा भाग समाप्त
पर क्या वेदांत का इजहार सही मायनों में प्रेम का इज़हार था.. या केवल एक अच्छे दोस्त का दूसरे दोस्त के प्रति प्रेम.. क्या था वो... क्या इस प्रेम को उसकी मंजिल मिली या नहीं.... जानने के लिए पढ़ते रहिये आकर्षण

आकर्षण

वेदांत : अब दर्द कैसा है .. खाना खा लिया..??
मैंने ना में सर हिला दिया..
वेदांत : आ जा ! मैं भी अकेला हूँ ! साथ में खाते हैं...
मैंने लंच उठाया और उसकी क्लास में चली गई.. हमने पहली बार साथ लंच किया... वो बड़ा ही मासूम लग रहा था.. जाने वो क्या था.. वो मेरा उसकी तरफ होने वाला अबोध .. निष्पाप, निष्काम, पहला आकर्षण...आज भी दिल में महसूस होता है...!!!
हमारा अब रोज का यही हो गया.. बस में होम वर्क कॉपी करना और साथ में लंच करना... हमारी दोस्ती जो बस यूँ ही शुरू हुई थी और प्रगाढ़ होने लगी... अब वो मुझे अपनी कक्षा के किस्से-कहानियाँ लंच में सुनाता... किसने किसको चांटा मारा, किसने किसकी स्कर्ट खींची, किसने किसे प्रोपोज किया, किसने अध्यापिका को पेन मारा.. वगैरा-वगैरा..
हम लंच के दौरान उसकी कक्षा की बातें किया करते थे और बस में मेरी कक्षा की..
बस इसी तरह साल से भी ज्यादा गुज़र गया हम आठवीं में पहुँच गए...
एक बार अचानक खाते-खाते उसने मुझसे पूछा- यह ब्रा क्या होती है...???
आसपास की सभी लड़कियाँ मेरी तरफ देखने लगी...
और मुझे भी समझ नहीं आ रहा था कि क्या जवाब दूँ.. और कैसे दूँ जो इसे समझ आ जाये और अश्लील भी न लगे..
मैंने उत्तर दिया- ब्रा एक तरह की बनियान होती है... अब और कुछ मत पूछियो इससे ज्यादा मुझे भी नहीं पता...
वो बोला- इतना भड़क क्यों रही है..? तेरे से पैसे थोड़े ही मांगे हैं...
मैंने भी बात टाल दी..!!
हमारी इतनी गहरी दोस्ती.. अब सबकी नज़रों में खलने लगी थी.. उसकी कक्षा के बच्चे और मेरी कक्षा के बच्चे अब हमारे बारे में बातें बनाने लगे थे.... सबको लगता था कि हम दोनों प्रेमी हैं... मुझे भी मेरी क्लास की लड़कियाँ उसके नाम से चिढ़ाती थी.. खैर मुझे बुरा नहीं लगता था.. क्यूंकि अब मैं भी उसकी तरफ मन ही मन आकर्षित होने लगी थी... उसे देखना.. उससे बात करना.. उसके साथ समय बिताना अच्छा लगता था.. और फिर वो उम्र ही ऐसी थी... दूसरे लिंग के प्रति आकर्षण स्वाभाविक था...!!
पर लोगों का हमारे बारे में बातें बनाना उसे बुरा लगता था.. उसका स्वच्छ, काम-रहित मन.. उसे वो सब गन्दी बातें सुनने की और झेलने की इजाज़त नहीं देता था.. इसीलिए उसे गुस्सा आता था.. कि सब हमारी साफ़ सुथरी दोस्ती को गन्दी और गलत नज़रों से देखते हैं.. मुझसे उसके चेहरे की वो परेशानी वाली लकीरें देखी नहीं जाती थी.. माथे पे पसीना.. आँखों में आग... जैसे किसी को अभी मार डालेगा...ऐसे में मेरे मन में एक तरकीब सूझी..मैं जब शाम को उससे मिलने गई..
तो...
वेदांत : आ गई तू.. यह ले होमवर्क मैंने कर लिया अब तू भी पूरा कर ले..
मैं : मेरा मन नहीं है.. तू ही कर देना कल सुबह बस में.... अच्छा सुन.. आज तू इतना गुस्से में क्यों था..(मुझे तो मन ही मन पता था कि वो गुस्से में क्यों है... क्यूंकि उसकी क्लास में मेरे और भी कई दोस्त थे... वो सब मुझे भी चिढ़ाते थे..)
वेदांत : कुछ नहीं रे, बस ऐसे ही... क्लास के बच्चे आजकल कुछ ज्यादा ही बकवास करने लगे हैं...हम दोनों के बारे में ! कुछ भी बोलते रहते हैं..!!
"क्या बोलते हैं..??"
वेदांत : कभी पूछते हैं... बात आगे कहाँ तक बढ़ी... अरे... तू किसी और लड़की से बात मत करना वरना वो जल-भुन जाएगी.. और पता नहीं क्या क्या..
उसकी आँखों में फिर से वही ज्वालामुखी सा गुस्सा उबाल मारने लगा...
मैं : तू टेंशन मत ले ! शांत हो जा.. मैं कुछ करती हूँ..
वेदांत : क्या करेगी तू..? यह अफवाह अगर फैलते फैलते घर तक पहुँच गई तो..? जो परेंट्स हम पे इतना भरोसा करते हैं... वो हमें एक दूसरे से बात भी नहीं करने देंगे..और तो और वो समझेंगे भी नहीं कि यह सिर्फ दोस्ती है... और इससे ज्यादा कुछ नहीं...
मैं इस बात से परेशान नहीं थी की घरवालों को पता चला तो क्या होगा.. मैं इस बात से परेशान थी.. कि यदि यह सब बातें सुन कर.. और इतना सब सोच कर कहीं उसने मुझसे दूर कर लिया तो....?
मैं : तू थोड़ी देर शांत हो.. मुझे सोचने तो दे...
मेरी बात काटते हुए ...वो बीच में बड़बड़ाने लगा।
मैं चिल्ला के : तू चुप करेगा.. प्लीज..
थोड़ी देर सोचने के बाद मेरे दिमाग में एक खुराफाती ख्याल आया..
मैं : वेदांत क्यों न हम अपने खाने की जगह बदल दें..
वेदांत : और कहाँ खायेंगे...?? तेरे सर पे...?
मैं: तू न ज़रा ठण्ड रख... सुन.. हमारे स्कूल में तीन मुख्य हाल हैं... एक है प्रार्थना हाल, दूसरा साक्षात्कार हाल और तीसरा क्रियाकलाप हाल..
वेदांत : हैं तो.. इसमें क्या नया है....काम की बात बोल...!!!
मैं: तो मैं सोच रही हूँ कि प्रार्थना और साक्षात्कार हाल, प्रधानाचार्य के कक्ष के सामने हैं और तीसरा क्रियाकलाप हाल उनके कक्ष के ठीक पीछे... ऐसे में वहाँ पर कोई बच्चा नहीं फटकता...तो हम क्या करेंगे कि.. मैं बस में ही तुझे अपना लंच दे दूंगी.. बेल बजते ही तू क्रियाकलाप हाल में अपना और मेरा खाना लेकर पहुँच जाना ! मैं बेल बजते ही वह आ जाऊँगी.. कोई पूछेगा लंच करने को तो कह दूगी आज कल वज़न ठीक रखने के लिए मैं दोपहर में खाना नहीं खाती...
वेदांत : जब तुम्हें खाना खाना नहीं है तो क्यों ले के आओगी...मैं क्या अकेले हाल में जा के खाऊंगा...!!
मैं: उफ्फ्फ ये लड़का... बस तू मुझसे कोई सवाल मत कर .. कल देखते जाना... और हाँ अब हम क्लास के दौरान भी कम ही मिला करेंगे...
वेदांत उदास हो गया..
मैं : ये तू न बड़ा इमोशनल अत्याचार करता है.. ठीक है मिल लेंगे..झुरमुट कहीं का...!!!
मुझे उन दिनों नाम बिगाड़ने और नए बनाने की बड़ी गन्दी आदत लग गई थी जो आज तक नहीं छूटी....
खैर.. अब हम रोज़ हाल में खाना खाने लगे..
अब हमारे सहपाठियों को और मौका मिल गया बोलने का... अब कक्षा में हमारे अलग होने की चर्चा होने लगी.. हमारा सबके सामने एक दूसरे से बात न करना उनकी इस सोच का कारण था.. परन्तु हमारे पास भी कोई विकल्प नहीं था...
वैसे हाल में अकेले में सिर्फ और सिर्फ उसके साथ रहना और बातें करना मुझे बेहद लुभाता था.. धीरे धीरे इसी तरह हम बड़े होने लगे समय बीतने लगा... समय के साथ उसका कद 4 फुट से 5 फुट हो गया.. आँखों में चमक... शरारत भरी कातिलाना मुस्कान से वो अपनी कक्षा की कई लड़कियों के दिलों पर राज करने लगा...यहाँ तक कि हमारे अलग होने की खबर के कुछ ही महीनों बाद उसे एक लड़की ने एक प्रेम पत्र लिखा.. उसमें किसी का नाम नहीं था.. शायद उसने ऐसा पहले इसीलिए नहीं किया क्यूंकि मैं उसके साथ हर समय रहती थी... और हमारे प्रेम संबंधों की अफवाह से सभी लड़कियाँ उससे दूर भागती थी और मुझे भी कोई लड़का आंख उठा कर नहीं देखता था...
उसके लिए यह एक मौका था और दोस्त बनाने का.. पर हमारी बातें सिर्फ हम तक ही रहती थी... कोई भी बात चाहे वो यौन क्रीड़ाओं से सम्बंधित हो या फिर, नंगी साइटों से, या नंगी फिल्में हों हम सब कुछ आपस में बाँटते थे.. साथ देखने की हिम्मत अभी तक नहीं थी...
उसी दौरान उसकी दादी का देहांत हो गया वो तीन दिन तक स्कूल नहीं आया...
सभी मुझसे पूछते थे.. चूँकि वो मेरे घर के सामने रहता था.. मैं जानते हुए भी कुछ नहीं बोलती थी... कि वो क्यों नहीं आ रहा.. मैं उन्हें और कोई बात बनाने का मौका नहीं देना चाहती थी...
पहले दिन शाम को जब स्कूल से घर पहुँची तो मम्मी ने बताया- वो लड़का है न, वो तो रोया ही नहीं... सब रो रहे थे.. पर उसकी आँखों में एक भी आंसू नहीं था...
कह के मम्मी नहाने चलीं गईं...
मम्मी ने तो मुझे परेशानी में डाल दिया था.. मैं उसके घर नहीं जा सकती थी.... बच्चो का ऐसे मौके पे जाना मना होता है....!!
तीन दिन बाद उससे बस में मिली... वो बेहद शांत, चुपचाप था... मैंने उसका ध्यान दूसरी ओर करने की कोशिश की..
मैं: तू तीन दिन से स्कूल नहीं आया .. ला अपनी नोटबुक दे.. मैं लिख देती हूँ...
वेदांत ने कुछ प्रतिक्रिया नहीं दी...
मैं : अच्छा सुन मेरे दिमाग में एक मस्त खुराफाती तरकीब आई है इस होमवर्क नाम के कीटाणु से निपटने की..
उसका इस पर भी कोई जवाब नहीं आया.. पर मैंने अपनी बात कहनी जारी रखी : तरकीब यह है कि हम दोनों एक ही कॉपी पर दो कवर चढ़ाएंगे एक पर तेरा नाम होगा और दूसरे पर मेरा.. जब तेरी क्लास होगी तो तू मेरा कवर उतारकर नीचे कर देना और मेरी होगी तो मैं तेरा कवर उतार कर नीचे कर दूंगी इस तरह कक्षा में दोनों का कार्य भी होता रहेगा.. और पता भी नहीं चलेगा.. पर तू कवर को टेप या गोंद से चिपका मत देना..!!!
वो अब भी कुछ नहीं बोला.. शायद उसने सुना ही नहीं था..
मैं : तू सुन रहा है कि नहीं .. ओह सुन ले...!! चल छोड़ तू अपनी कॉपी दे...
काफी देर उसके सामने हाथ बढ़ाये रखने के बाद भी जब उसने मुझे कॉपी नहीं दी तो...
मैं झल्लाते हुए : दे ना..!!!
क्या है..?
देता क्यों नहीं...!!! किस्मत वालों को मुझसे काम करवाने का मौका मिलता है और तू अपने ही ख्यालों में खोया है...!!!
वेदांत : तू कभी अपने मम्मी-दादी से दूर हुई है....??
उसके सीधे से सवाल में उसकी उदासी की नमी थी....!!!
मैं कुछ नहीं बोली..
एक अजीब सी ख़ामोशी छा गई, एक सवाल ने हम दोनों के बीच की तीन दिन की दूरियों को खाई में बदल दिया...
दादी भले ही उसकी माँ के दूर होने के बाद .. उसकी देखभाल के लिए आईं थीं .. पर वो कभी उसकी माँ की जगह नहीं ले सकी... शायद यही वजह थी कि दादी के जाने के बाद .. उसकी आँखों से आँसू नहीं निकले.. बात चाहे कुछ भी हो.. कोई चाहे हमें कितना भी प्यार .. दुलार कर ले.. पर माँ की कमी तो सिर्फ माँ ही पूरी कर सकती है.. बच्चे के दिल में उसकी जो जगह होती है .. वो कोई नहीं ले सकता.. और न वो माँ वाला प्यार उसे कोई दे सकता है.. माँ डांटती भी है तो भी उसमें प्यार झलकता है.. पिता चाहे दूसरी माँ ले आए, या खुद माँ बनकर प्यार देना चाहे.. पर बच्चा जब माँ की कोख में होता है.. उनका रिश्ता वहीं से बनना शुरू हो जाता है.. पिता का अस्तित्व तो बच्चे के पैदा होने के बाद आता है.. जबकि माँ का अस्तित्व भ्रूण के बनने से लेकर आजीवन रहता है...
मैं अपने मन के द्वंद्व में खो गई थी.. कि अचानक फिर वो ही सवाल मेरे कानो में गूंजने लगा...
क्या तुम कभी अपनी मम्मी-डैडी से दूर हुई हो..??
उसकी सवाल करती नज़रें मेरे भीतर सूई सी गड़ी जा रहीं थी...
मैंने एक साधारण सा जवाब दिया... " कोई बात नहीं... होता है.. मैं समझ सकती हूँ .!!!"
वेदांत : सबके साथ नहीं होता..मेरे साथ ही हुआ है.. तू नहीं समझ सकती न ही कभी समझ पायेगी.. तेरे पास सब हैं..!!!
वो बस में दूसरी जगह पर जा बैठा..
थोड़ी देर बाद स्कूल भी आ गया.. सभी बच्चे बस से उतरने लगे, मैं अपनी जगह पर खड़ी उसका उसकी सीट से हिलने का इंतज़ार कर रही थी..
धीरे धीरे बस खाली होने लगी.. अंत में मैं और वो ही बस में रह गए.. कंडक्टर भैया आए और उन्होंने हमें उतरने को कहा....
वो चुप था.. उसकी गर्दन झुकी हुई.. नज़रें जैसे जमीन में गड़े जा रहीं हो...!!!
मैं : मुझे पता है तेरा स्कूल जाने का मन नहीं है.. मेरा भी नहीं है.....!! चल कहीं घूमने चलते हैं...!!! क्या बोलता है...??
उसने नज़रें उठा, मेरी बड़ी सी नटखट आँखों में देखा...
मैंने उसका हाथ पकड़ा और स्कूल के अन्दर जाने की बजाये बस स्टैंड ले गई...
उसने कोई विरोध नहीं किया... मूक बना मेरी और देखता रहा और चलता रहा ..
मैं उसे बस में बता कर एक सिनेमा हाल ले गई... वह फिल्म लगी थी.." मैं हूँ ना"
मैंने पॉकेट मनी निकाली और दो टिकट ले लिए..
फिल्म 11 बजे शुरू होनी थी...मैं उसे एक उद्यान में ले गई... वहाँ कई लोग सैर कर रहे थे.. प्रेमी जोड़े छिप छिप के बैठे एक दूसरे का आलिंगन कर रहे थे..
उसका चेहरा तब भी उतरा हुआ था.. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं कैसे उसे ठीक करूँ...
मुझे फिर वही तरकीब याद आ गई...
उद्यान में सामने ही काँटों वाला पौधा था, उस पर गुलाबी रंग के फूल लगे थे...
मैं फूल तोड़ने गई.. और जान बूझ कर काँटों में हाथ दे दिया...
मैं : आ उच्च ...सी सी....
कांटा पौधे से उखड़ मेरी हथेली में घुस गया था.. खून निकल रहा था.. पर मैंने भी फूल हाथ से नहीं छोड़ा...
जब मेरे इस कारनामे पर भी उसका ध्यान नहीं गया तो मैंने उन्हीं रक्त भरे हाथों से उसके सामने फूल कर दिया...
यह काम कर गया...
उसकी नज़र फूल से पहले मेरी हथेली पर गई...
उसने झट से मेरे हाथ से फूल छुडा कर फेंक दिया... मेरे हाथ थाम कर हथेली को अपने हाथ पर रख दूसरे हाथ से कांटा निकालने लगा..
वेदांत: दर्द तोह नहीं हो रही.. क्यों करती है तू ऐसे.. ???
मैं उसी को देख रही थी...
मैं: तू क्यों करता है ऐसे..???
वेदांत : कम से कम तेरी तरह खुद को नुक्सान नहीं पहुंचाता..
मैं: खुद को नुकसान नहीं पहुँचाता परन्तु औरों को पहुँचाता है.. तेरे ना बोलने से बात न करने से... मैं कितनी अकेली हो जाती हूँ, कभी सोचा है तूने...??
वेदांत अभी भी मेरी बात नहीं सुन रहा था.. बस ज़ख्म देख उसे सहला रहा था...
अचानक तेज़ी से उसने पानी की बोतल निकाली, मेरे हाथ धुलाए....और बोला.. "चल अब बैठ जा आराम से.. थोड़ी देर में फिल्म का समय होने वाला है... लंच कर लेते हैं.. अंदर खाने पीने की वस्तुएँ ले जाना मना है..."
तब जाकर तो मेरी जान में जान आई..
हम फिल्म देखने हाल में पहुँचे.. कि कुछ समय बाद माँ-बेटे का भावनात्मक जुड़ाव और.. रोना धोना देख उसकी आखें भी भर आईं...
उसने मेरे कंधे पर सर रख लिया.. मेरा चोट वाला हाथ हाथों में ले लिया...
वेदांत : माँ ने भी मुझे छोड़ दिया.. और अब दादी भी चलीं गईं ... तू तो नहीं छोड़ के जाएगी ना मुझे..???
वो बहुत व्यथित था.. उसकी आवाज़ में दर्द और गले में कुण्ठा थी... वो रो रहा था... मैंने दूसरे हाथ से उसके चेहरे को छुआ.. गाल गीले थे...
मैंने उसके आँसू पौंछ दिए..
मैं: नहीं जाऊँगी..पर तू भी वादा कर... मुझसे बात करनी बंद नहीं करेगा...!?
उसने मेरे चोट वाले हाथ पे हाथ रख दिया और मैंने भी उसके दूसरे पर दूसरा हाथ रख दिया..
वेदांत : वादा ..!?
मैं: वादा..!!!
मैं खुश थी.. वो अब पहले से कुछ ठीक था...!!!
इंटरवल में फुल्ले खाकर और फिल्म देख कर हम बाहर निकले, बस पकड़ी और घर चले गए..
उस दिन मेरे मन में अपार संतुष्टि थी...!!!
कुछ पलों के लिए इस प्रेम कथा को द्वितीय विराम देते हैं !
आपको क्या लगता है.. मेरा एकतरफा आकर्षण क्या प्रेम का रूप लेगा.. क्या मेरे प्रेम को वेदान्त कभी स्वीकार कर पायेगा.. हमारे यौवन की तरफ बढ़ते कदम क्या उम्र से पहले कहीं बहक तो नहीं जायेंगे.. जानने के लिए पढ़ें

सर्दी की रात कुँवारी कन्या के साथ

सर्दी की रात कुँवारी कन्या के साथ

प्रेषक : जहाँपनाह
चूत की मल्लिकाओ और लण्डों के पुजारी
आज तुम्हारा भोंसड़ा फाड़ने की बारी है हमारी
जहाँपनाह के दरबार में
चूत सजी भयानक काले लण्ड के इन्तजार में....
सर्दियों का दौर था, चारों तरफ हमारे लण्ड का शोर था।
मैं बचपन से ही गर्म किस्म का इंसान हूँ, हसीन लड़की या औरत मेरी कमजोरी है ! मेरा लण्ड 9 इंच का है जिसकी प्यास बुझाना सबके बस की बात नहीं !
मैं अपनी पहली कहानी लेकर आपके सामने आ रहा हूँ क्योंकि मैं चाहता हूँ कि आप मुझे मेरे लण्ड की प्यास बुझाने का कोई उपाय बताएँ ! मेरा पहला सेक्स आपके सामने हाज़िर है ...
बिचपुरी का वो कॉलेज है जहाँ के लण्ड बहुत ही मशहूर हैं।
मैं कॉलेज से अपने कमरे पर जा रहा था, जहाँ मैं अकेला रहता हूँ। मैंने कभी कोई साथी कमरे में नहीं रखा क्योंकि रात में मेरे सेक्स की आग जाग जाती है, मैं आग में जलने लगता हूँ और आप सोच ही सकते हैं कि मेरे साथ में रहने वालों का क्या हाल होगा?
मेरे कई दोस्त मेरे लण्ड का स्वाद ले चुके हैं ! यह तो मेरी यौनेच्छा की बात है।
मुझे कमरे तक पहुँचने के लिए गर्ल-हॉस्टल के सामने से बस पकड़नी पड़ती है। मैं सड़क पर खड़े होकर गाड़ियों को हाथ दे रहा था कि तभी एक लम्बी कार मेरे सामने आकर रुकी, शीशा खुला, मैं देखते ही मानो होश खो बैठा ! ऐसा फिगर मैंने तब तक नहीं देखा था,
36-24-32,
क्या चूचियाँ थी !
गोरे गाल बिल्कुल दूध की तरह,
गुलाबी होंठ जैसे बुला रहे हों कि आओ हमें चूस लो !
काले और लम्बे बाल, जो खुले हुए थे, उसकी उम्र लगभग 18 साल होगी, वो इतनी सेक्सी लग रही थी कि मुझे लगा कि मैं खड़े-खड़े झड़ जाऊँगा।
उसने पूछा- कहाँ जाना है आपको?
.........बोदला !
उसने अंदर आने का इशारा किया और मैं चुम्बक की तरह आगे वाली सीट पर बैठ गया। मेरी नज़र उसकी चूचियों से हट ही नहीं रही थी, उसके गोरे गालों को चूमने का मन कर रहा था। उसने लाल रंग का शॉर्ट टॉप और काले रंग की जींस पहन रखी थी।
क्या देख रहे हो? उसने कहा।
तो मैं झिझक गया ....नहीं कुछ तो नहीं ! आप इतनी सुन्दर हैं कि कोई भी आपको देखता ही रह जाएगा !
उसने अपना हाथ गेयर की तरफ बढ़ाया और मेरी घुटने पर रख दिया।
तभी मेरा लौड़ा और तन गया ! मैंने अपने लण्ड को दोनों हाथों से छिपा रखा था ताकि वो देख ना ले !
उतारते समय उसने अपना विज़िटिंग कार्ड देकर अगले दिन आने को कहा।
सॉरी, मैं उसका नाम बताना भूल गया- उसका नाम आकांक्षा था।
अगले दिन मैं दिए पते पर पहुँच गया !
दरवाजा खुला, आज आकांक्षा कल से ज्यादा स्मार्ट लग रही थी !
उसने मुझे चाय के लिए पूछा, मैंने मना कर दिया।
आकांक्षा उंगली का इशारा करके अपने बेडरूम में चली गई। पीछे पीछे मैं भी चला गया। वो अपने कपड़े उतारने लगी !
तुम कल क्या देख रहे थे ?
मैंने सोचा कि तुम्हें आज सब कुछ दिखा देती हूँ.....
इतना सुनते ही मैंने उसके होंठ चूस लिए, वो तड़प उठी जैसे बिन पानी मछली !
आकांक्षा ने आज काले रंग की ब्रा और काले रंग की ही पैंटी पहन रखी थी। उसका जिस्म फूलों की तरह महक रहा था !
उसने अपने काले और लम्बे बाल खोल कर कहा- देख लो, जो देखना चाहते हो ! जितना करीब से चाहो !
मैं भूखे शेर की तरह टूट पड़ा !
मैं उसकी गोल-मटोल चूचियों को ब्रा के ऊपर से ही दबाने लगा।
वो मुझसे लिपट गई।
मुझे लगा कि मुझसे भी ज्यादा गर्म लोग हैं इस दुनिया में, जो जिस्म की आग में तप रहे हैं !
मैंने आकांक्षा के जिस्म से आखिरी कपड़े भी अलग कर दिए !
अब वो मेरे कपड़े उतारने लगी तो मैं उसकी पीठ सहलाने लगा।
मैंने धीरे से उसके कान को काट लिया, उसके मुँह से उफ्फ्फ्फफ्फ़ की आवाज़ आई। वो मुझसे सांप की भांति लिपट गई।
मैंने उसे उठा कर उसकी चूचियों को मुँह में लेना चाहा तो उसने पहले चूत की तरफ इशारा किया।
मैं तभी चूत की तरफ मुड़ गया !
आकांक्षा की चूत बिलकुल टमाटर की तरह लाल और अंगूर की तरह छोटी थी।
मैंने चूत को मुँह में ले लिया और जोर जोर से चाटने लगा ! उसके मुँह से आह आहह की आवाज़ निकलने लगी।
उसने एक हाथ से मेरा लण्ड सहलाना शुरु कर दिया। उसका एक हाथ मेरे सर पर था, वो मुझे ऐसे दबा रही थी कि मानो कह रही हो- मेरी चूत में घुस जाओ !
इतनी कामुक औरत मैंने अपनी जिंदगी में नहीं देखी !
मैं कोमल के ऊपर आ गया। अब मेरा लण्ड उसके मुँह में था और मैं उसकी चूत का स्वाद ले रहा था !
वो लण्ड को ऐसे चूस रही थी कि जैसे लग रहा था कि काट कर खा जाएगी !
मैं उसे मना नहीं कर पाया, मुझे बहुत मज़ा आ रहा था !
20-25 मिनट तक हम एक दूसरे को चाटते रहे ! इस बीच वो दो बार पानी छोड़ चुकी थी मगर मेरा निकल ही नहीं रहा था !
मैंने अपना लण्ड उसके मुँह से निकालना चाहा तो जिद करने लगी- मुझे पानी पीना है !
मैंने समझाया- चूत में डालेंगे तो पी लेना !
वो मान गई !
मैंने उसके होंट चूसना शुरु कर दिए और एक हाथ से आकांक्षा की चूची मसलने लगा। वो मेरा पूरा पूरा साथ दे रही थी। उसका हाथ मेरी पीठ को सहला रहा था। वो जिस्म की आग से तप रही थी। उसने मुझे अपनी ओर खींचा जैसे कह रही हो- मेरे जिस्म में समा जाओ !
मैंने उसके जिस्म को ऐसे चाटना शुरु किया जैसे वो कोई लॉलीपॉप हो !
वो उफ़ उफ़ उफ़ किये जा रही थी और कह रही थी- फाड़ दो ! मेरी चूत फाड़ दो ! मेरी प्यास बुझा दो ! जानू मेरी चूत को चोद कर भोसड़ी बना दो ! मेरी प्यास बुझा दो ! मेरे जिस्म को ठंडा कर दो ! मेरी आग बुझा दो !
करीब 30 मिनट तक मैं उसे चाटता रहा !
उसने मुझे ऊपर खींच लिया- डाल दो, डालो न ! क्यों तड़पा रहे हो ? प्लीज डाल दो जानू ! मेरी जान, मेरी चूत में घुस जाओ !
मैंने अपना लण्ड उसकी चूत पर रखा ही था कि वो दर्द के मारे रो उठी, मैं समझ गया कि वो कुंवारी बुर थी !
बिस्तर पर खून ही खून !
वो डर गई !
मैंने उसे समझाया कि ऐसा पहली बार में होता है, बस थोड़ी देर में सब ठीक हो जायेगा।
मैं जोर जोर से झटके मार रहा था और आकांक्षा भी मेरा साथ दे रही थी। ऐसा लग रहा था कि जैसे उसे दर्द हो ही न रहा हो !
मैंने पूछा तो बोली- दर्द से बड़ी प्यास है ! पहले मेरी प्यास बुझ जाये ! प्लीज फाड़ डालो ! होने दो दर्द ! फट जाने दो मेरी चूत को !
मेरा 9 इंच का लण्ड उसकी योनि के अंदर ऐसे जा रहा था जैसे कोई गर्म छड़ हो ! और वो बार बार कह रही थी- साली को फाड़ दो ! मेरी चूत को फाड़ दो ! मेरी जान, मेरे प्यारे राजा !
मैं उसकी चूत चोद ही रहा था कि अचानक दरवाज़ा खुला !
अब मेरे पैरों तले जमीन नहीं रही !
आगे की कहानी आपके मेल मिलने बाद ! कि मेरा क्या हुआ ? दरवाज़े के पीछे कौन था जानने के लिए मुझे मेल करें !

"आकर्षण"


यह कहानी कुछ लम्बी होने साथ साथ, मनुष्य के द्वंद्व, भावनाओ, कर्मों और निर्णयों को आज़माती है..!!! आशा है आपको पसंद आएगी...
यह कहानी है छोटी वृंदा और वेदांत की... जो छुटपन से साथ थे, साथ खेले, घूमे, पढ़े और बड़े हुए...
वृंदा के पिता एक व्यवसायी थे और माता एक गृहिणी।
वेदांत के पिता एक इंजिनियर थे और शहर के पुल, इमारतें के खाके बनाते और असल ज़िन्दगी में उन्हें जीवंत करते...
वेदांत के पिता और माँ में तलाक हो चुका था, वेदांत अपने पिता और अपनी दादी के साथ हमारे सामने वाले घर में रहता...
वो और मैं बचपन में साथ खेले और एक ही स्कूल जाते थे ... वो मुझसे उम्र में एक साल बड़ा था पर फिर भी हम एक ही कक्षा में थे..!
फर्क केवल इतना था कि वो कक्षा के दूसरे विभाग में था पर हमारी कक्षाएँ साथ साथ थी... हम दोनों बहुत अच्छे एवं घनिष्ट मित्र थे, मैं उसके लिए अपनी कक्षा की किसी भी लड़की या लड़के से भिड़ सकती थी...वो थोड़ा सीधा था... और मैं थोड़ी शरारती... फिर भी हमारे बीच कभी लड़ाई या मनमुटाव नहीं हुआ था...
हम दोनों को सुबह स्कूल बस लेने आती थी, वही स्कूल बस हमें दोपहर में भी घर तक छोड़ती। उसके बाद वो अपने घर चला जाता, मैं अपने घर ! हम दोनों के घरों में पढ़ाई को लेकर बेहद सख्ती थी, हमें पढ़ाई ख़त्म किये बगैर खेलने जाने नहीं दिया जाता था... हमारी ही सोसाइटी में हमारे हम-उम्र कई लड़के-लड़कियाँ थे पर हमारी जैसी मित्रता किसी की नहीं थी। मैं उसके घर उसके साथ कैरम खेलने जाती थी और वो मेरे साथ बैडमिंटन खेलने आता था...
खेल कूद के बाद हम दोनों शाम मैं अपने अपने घर जाते और रोज़मर्रा की क्रियाओं में व्यस्त हो जाते... हमारी यह गहरी दोस्ती करीब तब से थी जब उसके पिता उसकी माँ से तलाक ले हमारी सोसाइटी में रहने आए थे !
उन दिनों वो बेहद शांत रहता.. माँ को याद करता था उसका यहाँ कोई दोस्त भी नहीं था.. बहुत जतनों और कई चोकलेट खिलाने के बाद मेरी उससे दोस्ती हुई... तब मैं 11 साल की थी, मुझे आज भी वो दिन याद है, रविवार था, मैं पार्क में झूला झूल रही थी और वो ऐसे ही जाने किस सोच में डूबा बेंच पर बैठा कुछ सोच रहा था ... मैं उसका नाम पुकार कर उससे कह रही थी- देखो मैं कितना ऊँचा झूल रही हूँ...
मैं : वेदांत... देखो देखो.. और ऊँचा... और ऊँचा.. देखो ना...
वो मेरी और देख नहीं रहा था.. और शायद सुन भी नहीं रहा था...
मैंने उसका ध्यान बटाने की एक बार फिर कोशिश की...
मैं : देखो वेदांत खड़े होकर ! बहुत मज़ा आ रहा है... तुम भी झूलो ना आकर ... वेदान्त.... वेदांत ! ओफ्फ्फो ....
वो वैसा ही गुमसुम बैठा घास की ओर देखे जा रहा था...
मैंने उसका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की एक और कोशिश की...
मैं : देखो वेदांत ! हाथ छोड़ के ...!!!!
बस मैंने इतना बोला ही था और एक झटके के साथ में झूले की उच्चतम छोर से नीचे गिर पड़ी...!!
वो दौड़ा दौड़ा मेरे पास आया.. " चोट तो नहीं लगी...? पागल है क्या तू... ज्यादा सुपरमैन बनने का शौक चढ़ा है... जा छत से भी कूद ले.. बेवक़ूफ़ लग गई न अब..." वो गुस्सा करते हुए बोला..
उसका गुस्सा शांत हुआ तो उसने भाषण देना शुरू कर दिया,"क्या कर रही थी? कैसे गिर गई?"
मैं : तू सुन ही नहीं रहा था !!!
वेदांत : हाँ कभी पीछे से आवाज़ दोगी और अगर कभी गलती से नहीं सुना.. तो क्या गिर पड़ेगी?
मैं : नहीं, कुत्ते दौड़ा दूँगी तेरे पीछे..!
और मैं खिलखिला कर हंसने लगी...
वेदांत : बड़ी हंसी आ रही? अभी बताएँगे ना जब अंकल आंटी तब पता लगेगा...!!! चल अब.. या शाम तक यहीं बैठना है..? चल बैंड ऐड लगवा ले...
वो बड़ा परेशां सा मेरा हाथ पहली बार पकड़ के घर ले गया.. उसका घर बेहद साफ़-सुथरा था, उसके पापा बाज़ार गए थे, दादी अपने कमरे में थी, वो मुझे दादी के पास ले गया।
दादी ने पहले मेरे सर पर प्यार से हाथ फेरा, उसे भी डांटा- तूने गिराया होगा जरूर इसे? प्यारी सी है इतनी !
मैं शरारत भरी निगाहों से उसे देख कर मुस्कुरा रही थी..
"चल आ जा हल्दी लगा दूँ !" दादी ने कहा।
वेदांत : नहीं दादी, बैंड ऐड..!
दादी : तुम बच्चे भी जाने क्या क्या कहाँ कहाँ से सीख कर आते हो, बैंड भी कोई भला चोट पे लगता है, आ बिटिया मैं तुझे हल्दी लगा दूँ...!!!
दादी ने मुझे रसोई में लेजा कर हल्दी लगाई और वेदांत को मेरा ध्यान रखने की हिदायत दी।
वहां से वेदांत मुझे मेरे घर ले गया और अब बारी उसकी थी मुझसे बदला लेने की !
उसने मुझे मम्मी के पास लेजा कर कहा, देखो आंटी यह गिर गई, यह ना पार्क में गंदे गंदे कुत्तों के साथ खेल रही थी, और देखो अब गिर गई, चोट लग गई...
मम्मी : हे भगवान्, यह लड़की भी ना ! चैन से तो इससे बैठा नहीं जाता, आफत की पुड़िया... वहाँ क्या खड़ी है? इधर आ अब, अच्छा हुआ कुत्ते ने नहीं काटा, नहीं तो पेट में बड़ी बड़ी सूइयाँ लगती न तब पता चलता इसे... , बेटा तुम कहाँ रहते हो??
वेदांत : आंटी, यहीं सामने वाले घर में !
कौन सी क्लास में हो?
जी छठी में !
यह निकम्मी भी छठी में है, पढ़ती तो कुछ है नहीं, इस बार पक्का फ़ेल हो जाएगी, बेटा तुम दोनों साथ में क्यों नहीं पढ़ लेते, तुम तो होशियार लगते हो, इसे भी कुछ सिखा दिया करो..!!!
मैंने मन में सोचा : वैसे मम्मियों को ना, अपने छोड़ के औरों के बच्चे अच्छे लगते हैं...!!!
वेदांत भी ना जाने क्या सोच रहा होगा..
मम्मी अपनी बात जारी रखते हुए : बेटा कौन से स्कूल में पढ़ते हो? कहीं ट्यूशन भी लगा रखी है क्या..??
वेदांत : नहीं आंटी, ट्यूशन तो नहीं है, 3-4 दिन पहले ही दाखिला लिया है अमिटी में..
मम्मी : अच्छा अच्छा, यह भी वहीं जाती है.. बेटा, मम्मी पापा क्या करते हैं,...??
वेदांत : जी मम्मी तो....................साथ नहीं हैं, पापा, इंजिनियर हैं..
मम्मी: च च च च, इतनी छोटी उम्र में बिना मम्मी के....
वेदांत : जी मैं और पापा दादी के साथ रहते हैं...!!
बातों का रुख मुड़ते देख उसने कहा : अब मैं चलता हूँ देर हो रही है...
मम्मी : ओह, ठीक है बेटा, आना ! हैं...?
उसके जाते ही... मैंने खीजते हुए कहा : क्या मम्मी.. कितना सवाल जवाब करती हो आप..???
मम्मी : बेटा पड़ोस में आये हैं खबर तो रखनी पड़ती है ना..!!!
मैं अपनी ही धुन में अपने कमरे में चली गई, शाम को पापा मेरे घुटने वाली चोट पर डॉक्टर से पट्टी करवा लाए.. अब मुझसे टांग मोड़ी नहीं जा रही थी, एक बार बैठने के बाद खड़े होने में तकलीफ होती, सुबह स्कूल के लिए तैयार होने में भी बहुत परेशानी हो रही थी, जैसे कैसे मैं तैयार हो घर से बाहर निकली, वेदांत बस्ता और पानी की बोतल लिए दरवाजे के पास ही खड़ा था ..
वेदांत : चल साथ चलते हैं...!!!
मैंने ड्रामा किया.. : आ आ आ चलने में दर्द हो रहा है .. थोड़ा धीरे चल..
उसने मेरी पानी की बोतल पकड़ ली.. और दूसरे हाथ में मेरा हाथ थाम लिया ताकि में फिर से न गिर जाऊँ..!!!
मैंने बात छेड़ी : वेदांत... तुम अपनी मम्मी का नाम लेते ही.. उखड़ क्यों जाते हो.. अपनी मम्मी से प्यार नहीं करते..???
वेदांत : नहीं री.. अपनी मम्मी से कौन प्यार नहीं करता.. मेरी मॉम, मेरे डैड से अलग रहती हैं... पहले हम साथ साथ रहते थे... फिर पता नहीं क्यों... मेरे मम्मी पापा अलग हो गए...तीन साल तक केस चला.. मेरी मॉम मुझे अपने साथ रखना चाहती थी.. और मेरे डैड भी मुझे अपने साथ रखना चाहते थे..
मैं: तुम किसके साथ रहना चाहते थे..???
वेदांत: कौन अपने मॉम डैड के साथ अलग अलग रहना चाहेगा.. मैं बस उन दोनों को साथ देखना चाहता हूँ...मैं दोनों से बहुत प्यार करता हूँ.. और वो दोनों भी मुझसे बहुत प्यार करते हैं... बस रहते अलग अलग जगह हैं...
इतने में बस आ गई... बात अधूरी रह गई..
वेदांत का चेहरा फिर से उतर गया था...वो फिर उसी उदासी की खाई में जा गिरा था, जहाँ से मैं उसे निकलना चाहती थी.. मैं सिर्फ चाहती थी कि वो अपने दिल की बात बस कह दे ताकि उसके दिल में चुभती सी हुई कोई भी बात उसे और परेशान न करे...
वो बस में मेरे साथ ही बैठा था.. पर मेरी उससे पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी... मैंने बात बदलते हुए कहा," अच्छा सुन, तूने मैथ का होमवर्क किया है...???, कल वो चोट लग गई थी ना कोहनी और घुटने में, तो मैं ना स्टाडी टेबल पे बैठ पाई न मैं होमवर्क कर सकी.. प्लीज तू कर दे ना... तू मेरा प्यारा सा अच्छा सा इकलौता दोस्त नहीं है...? है ना...? तो करदे ना प्लीज ....!!!
वेदांत : हाँ अभी आधा घंटा लगेगा स्कूल पहुँचने में ! ला कॉपी दे, मैं लिख देता हूँ ... नहीं तो क्लास के बाहर खड़ी होगी तो और टांग में दर्द होगी...!!!!
बस फिर वो सवाल करता रहा में उसे देखती रही.. और हम स्कूल पहुँच गए.. वो रिसेस में मुझसे मेरा हाल पूछने आया...
वेदांत : अब दर्द कैसा है .. खाना खा लिया..??
मैंने ना में सर हिला दिया..
वेदांत : आ जा ! मैं भी अकेला हूँ ! साथ में खाते हैं...
मैंने लंच उठाया और उसकी क्लास में चली गई.. हमने पहली बार साथ लंच किया... वो बड़ा ही मासूम लग रहा था.. जाने वो क्या था.. वो मेरा उसकी तरफ होने वाला अबोध .. निष्पाप, निष्काम, पहला आकर्षण...आज भी दिल में महसूस होता है...!!!
पहला भाग समाप्त...

पम्मी जी पप्पू जी


को काफी सराहा, मुझे कई सारे मेल मिले जिनमें से कई लड़कों और लड़कियों ने मुझसे उस औरत के नंबर मांगे तो मैं उन्हें यह बताना चाहूँगा कि हम कॉल बॉय कभी भी किसी ग्राहक का नंबर किसी को नहीं देते क्योंकि यह उनकी निजता का प्रश्न है।
दोस्तो, मैं चूत को पम्मी जी बोलता हूँ, लण्ड को पप्पूजी और गाण्ड को तरबूज, जो मुझे बहुत अच्छा लगता है किसी को शक भी नहीं होता है इन शब्दों से।
अब कहानी पर आते हैं !
यह बात उस समय की है जब मैं बारहवीं में पढ़ता था, मेरे ही पड़ोस में रहने वाली आंटी मुझे बहुत अच्छी लगती थी और लगती भी क्यों नहीं, वो थी ही ऐसी जबरदस्त कि अगर बुड्ढा भी उसे देखे तो उसका लण्ड तो क्या लण्ड के बाल भी कड़क हो जायें !
मैं रोजाना उन्हें छत से देखा करता था किताब लेकर ताकि किसी को शक न हो कि मैं उन्हें देख रहा हूँ, सभी को यही लगता कि मैं पढ़ाई कर रहा हूँ।उन्हें भी पता था कि मैं छुप-छुप कर रोजाना उन्हें देखता हूँ ! उनके पति शराब बहुत ज्यादा पीते थे और जल्दी ही सो जाते थे, फिर वो देर रात तक घर के आंगन में बैठी काम करती रहती थी। मैं उनसे कम ही बात करता था।
वो जब भी नहा कर बहार आती थी तो उनके शरीर पर सिर्फ एक तौलिया ही होता था और बाल खुले रहते थे जो उनके वक्ष को ढके रखते थे। फिर जब वो आँगन में बैठ कर अपने बाल संवारती तो गजब लगती थी।
ऐसे ही एक दिन मैं बाज़ार किसी काम से गया हुआ था, जब वापिस आया तो मम्मी ने कहा कि पास वाली आंटी आई थी, तुम्हें बुलाया है, उनके घर पर कोई नहीं है, उनके पति आज 6-7 दिनों के लिए ऑफिस के काम से बाहर जा रहे हैं तो तुम्हें उन्हीं के साथ रहना है कुछ दिन, और अपनी किताबें भी ले जाना ताकि वहाँ पढ़ाई कर सको !
मैंने कहा- ठीक है !
और मैं अपना स्कूल बैग लेकर उनके घर चला गया। काफी देर तक दरवाजा बजने पर भी अन्दर से कोई जवाब नहीं आया तो मैंने दरवाजे को जोर से धकेला तो वो खुल गया। मैंने पूरा घर देखा लेकिन वो कहीं नहीं दिखी तो मैंने सीचा कि शायद वो नहा रही हों।
जब बाथरूम के पास गया तो पता चला कि वो नहा ही रही हैं और दरवाजा भी बंद नहीं किया है। मैं छुप कर उन्हें देखता रहा, उनकी पीठ दरवाजे की तरफ थी तो मैं खुले दरवाजे से उन्हें देखता रहा उनकी गोल गोल तरबूज देख कर मेरा लण्ड कड़क हो गया।
तभी अचानक वो पलट गई लेकिन उनके मुँह पर साबुन लगा होने से मुझे नहीं देखा उनकी आँख में साबुन चला गया था, टंकी में पानी भी ख़त्म हो गया था तो वो बंद आँखों से डब्बे को ढूंढ़ रही थी लेकिन वो बाहर रखा हुआ था।
मैंने उन पर तरस खाकर डब्बा उनके हाथ में दे दिया।
डब्बा ले कर वो पलटी और बाल्टी से पानी डालने लगी अपने आँख पर ताकि साबुन निकल जाये। तभी उन्हें लगा कि डब्बा तो बाहर था फिर मुझे दिया किसने?
वो एकदम से पलटी तो सामने मैं खड़ा था।
वो जोर से चिल्लाई तो मैं डर कर कमरे में जाकर बैठ गया। फिर नहा कर वो कमरे में आई तो उनके शरीर पर सिर्फ तौलिया ही लपेटा हुआ था। आते ही उन्होंने मुझे डांटना शुरू कर दिया, मैं सर नीचे झुकाए चुपचाप उनकी बातें सुनता रहा।
तभी उनका तौलिया खुल गया जिसे मैंने फ़ौरन पकड़ लिया तो वो बोली- यह क्या कर रहे हो? तुम्हें शर्म नहीं आती अपनी आंटी के साथ ऐसा करते हुए? मैं तुम्हारी मम्मी को बोलूँगी।
तभी मैंने उनके होंटों पर अपने हाथ रख दिए और कहा- आपका तौलिया खुल गया था जिसे अभी भी मैंने ही पकड़ा है।
तो वो गुस्से से बोली- छोड़ो तौलिये को !
मैंने कहा- लेकिन यह खुल जायेगा !
तो वो बोली- मुझे कुछ नहीं सुनना है, तुम छोड़ो इसे फ़ौरन !
मैंने डर के मारे छोड़ दिया और गर्दन नीचे कर ली तो तौलिया नीचे गिरते ही उनकी बिना बालों वाली गोरी सी प्यारी सी पम्मी जी के दीदार हो गए।
मैं एकटक उनकी पम्मीजी को निहारता ही रहा और वो मुझे डांटे जा रही थी। मैंने उन्हें कहा- आप कपड़े तो पहन लो, उसके बाद जो करना है वो कर लेना !
तब वो समझी कि वो मेरे सामने बिल्कुल नंगी खड़ी हैं, वो शरमाई और तौलिया लपेट कर दीवार की तरफ मुँह करके खड़ी हो गई ! मैंने मौके का फायदा उठाया और अपने सारे कपड़े खोल कर उनके पास जा कर उनके कंधे पर हाथ रख कर कहा- आप घबराइए मत ! मैं किसी को भी यह बात नहीं कहूँगा कि आप मेरे सामने नंगी खड़ी थी और मुझे डांट रही थी और मैं चुपचाप आपकी पम्मीजी को देख रहा था !
तो वो और ज्यादा शरमा गई।
मैंने उन्हें अपनी ओर पलटाया और उनके हाथ ऊपर कर दिए और धीरे से उनके तौलिए पर हाथ रख दिया या यह कहो कि मैंने उनके चूचों पर हाथ रख दिया।
तभी उन्होंने अपने हाथ नीचे किये और अपनी आँखें खोली और उन्होंने मुझे धक्का दे दिया। मैं नीचे गिर गया !
तभी वो बोली- मेरी चूत चोदेगा? मेरी गाण्ड मारेगा तू? तेरी इतनी औकात कि तू मेरे साथ चुदाई करेगा? अबे तेरा है ही कितना अभी जो तू मेरी चूत की प्यास दूर कर सकेगा? दिखा तो सही मादरचोद तेरा 2-3 इंच का लण्ड भोसड़ी के?
तो मुझे गुस्सा आ गया और मैंने उन्हें अपना पप्पू हाथ में ले कर दिखा दिया कि यह लो देख लो जी भर के !
तो वो नाटक करते हुए बोली- बस इतना सा? मेरे पति का तो तुझसे बहुत बड़ा है !
तो मैंने उन्हें कहा- वो मुझसे उम्र में भी तो बड़े हैं तो जाहिर सी बात है बड़ा तो होगा ही !
लेकिन उनकी नजरें मेरे पप्पू से हट ही नहीं रही थी, ललचाई हुई नजरों से मेरे पप्पू को देख रही थी।
मैं समझ गया कि इसे मेरे पप्पू को अपनी पम्मी में लेने का मन कर रहा है।
फिर मैंने सोचा कि जो भी होगा देखा जायेगा, आज तो कबड्डी खेल ले !
मैं उनके पास तो था ही, फ़ौरन से उनके दोनों हाथ पकड़ लिए और उनके बूबे चूसने लगा। उन्होंने मुझसे जानबूझ कर छुटने की कोशिश नहीं की लेकिन फिर भी वो कसमसा रही थी।
मैंने उनके हाथ छोड़ दिए थे धीरे से मैं उनके तरबूज पर हाथ फेरने लगा।
अचानक से मैंने उनके तरबूज के बीच वाले छेद में अपनी अंगुली थूक लगा कर घुसेड़ दी तो वो एकदम से चिहुंक उठी लेकिन मैंने उन्हें ऐसा करने से मना किया।
थोड़ी ही देर में उन्होंने मेरा पप्पू अपने हाथ में ले लिया और प्यार से उसे मसलने लगी।
मुझे अच्छा लग रहा था, मैंने उन्हें घुटनों के बल बैठने को कहा और अपनी बेल्ट हाथ में ले ली जैसे ही वो नीचे बैठी, मैंने उनके दोनों हाथ पीछे ले जाकर बेल्ट से बांध दिए और उनका मुँह पकड़ कर खोल दिया ताकि मैं अपना पप्पू डाल सकूँ।
मैं ठंडा होने वाला था, वो कसमसाती ही रह गई और मैंने अपना सारा रस-मलाई उनके मुँह में डाल दिया।
वो मुस्कुराते हुए बोली- तुम बहुत ख़राब हो ! मेरे हाथ खोलो वरना मैं चिल्लाऊँगी।
मैंने कहा- ठीक है, चिल्लाओ ! जब कोई आ जायेगा तब क्या कहोगी कि मैंने क्या किया है?
वो कुछ सोचने लगी और कहा- अब मेहरबानी करके मेरे हाथ खोल दो, मैं भी वही सब चाहती हूँ जो तुम चाहते हो।
तब मैंने उसके हाथ खोल दिए और उसे अपना पप्पू मुँह में लेने को कहा ताकि वो फिर से तैयार हो जाये चुदाई के लिए !
वो धीरे धीरे से मेरा चूसने लगी, मैं उन्हें पलंग पर ले गया, उनकी पम्मी को चूसने लगा। वो मेरा पहले से ही चूस रही थी, मैंने अपना पप्पू उनके मुँह से हटा लिया और सिर्फ उनकी पम्मीजी को बेइंतहा प्यार करने लगा, यानि की चाटता रहा और वो सिसकारियाँ ले रही थी, उनके मुँह से सीईईई उफ्फ्फ्फ़ आःह्ह की आवाजें आने लगी।
मैं समझ गया कि अब इन्हें मेरा पप्पू चाहिए तो मैं उनसे पूछने ही वाला था कि उन्होंने मुझे अपने ऊपर खींच लिया और मेरे होंठ चूसने लग गई।
उन्होंने अपने एक हाथ से मेरा पप्पू अपने पम्मी के ऊपर रख दिया और मेरे तरबूज के बीच में अपनी अंगुली डाल दी। मैं एकदम से चिंहुका और मेरा पप्पू उनकी पम्मी के अन्दर घुस गया।
तभी उन्होंने एक ठंडी साँस ली और बोली- मुझे चोद दिया? जितना चोद सकते हो, चोद डालो मुझे ! आज मैं आज बहुत ज्यादा मजा लेना चाहती हूँ !
मैंने उन्हें कहा- अगर ज्यादा मजा लेना है तो पीछे करवा लो ! चूत से भी ज्यादा मजा आएगा आपको !
वो बोली- पीछे का छेद तो बहुत छोटा होता है, कैसे घुसेगा उसमें?
मैंने कहा- वो सब मुझे पर छोड़ो, मैं सब कुछ कर लूंगा, आपको पता भी नहीं चलेगा ! कोई ज्यादा तकलीफ़ नहीं होने दूँगा।वैसे पाठको, उनके पति का पप्पू मुझसे छोटा था मोटाई में बराबर ही था। उसने कहा- नहीं बाबा नहीं ! मैं तो मर जाऊँगी, मेरे पीछे मत डालना, आज तक मैंने उनसे भी नहीं डलवाया है।
तब मैंने उन्हें कहा- जब मेरा उनसे छोटा है, दुबला पतला है तो फिर क्यों डरती हो? पहली बार तो सभी के दर्द होता ही है, आपकी पहली चुदाई पर क्या आपको दर्द नहीं हुआ था और बच्चा पैदा करते हैं तब भी तो दर्द होता ही है, कम से कम उस दर्द से तो बहुत कम दर्द होगा आपको !
मैंने उनकी अलमारी से पोंड्स क्रीम निकाली और उनकी गाण्ड में अपनी अंगुली से डालता रहा और ढेर सारी अपने पप्पू पर भी लगा ली।
वो उलटी ही लेटी थी और मैंने अंगुली डालते डालते अपना पप्पू उनकी गाण्ड में डाल दिया एक झटके से !
वो चिल्ला रही थी तो मैंने उनका मुँह जोर से बंद कर दिया और दूसरा झटका भी दे डाला ताकि दूसरी बार उन्हें दर्द न हो।
उनकी आँखों में आंसू आ गए और मैं उनके ऊपर ही लेटा रहा। फिर जब वो चुप हो गई तब मैंने उनसे पूछा- क्या अब भी दर्द हो रहा है?
तो वो बोली- थोड़ा-थोड़ा हो रहा है।
मैं उन्हें घोड़ी की अवस्था में ले आया और अपना काम शुरु कर दिया यानि की गाण्ड चुदाई, अपने एक हाथ से उनके पम्मी की नाक मसल रहा था और दूसरे हाथ से उनके बोबे !
10 मिनट में में उनकी गाण्ड में ही ठंडा हो गया।
फिर वो सीधी हो गई, बोली- मेरी चूत की आग को कौन ठंडा करेगा अब?
मैंने कहा- मेरे शेर को फ़िर से तैयार करो, फिर देखना कि कैसा बैंड बजाता है मेरा शेर !
तब उसने कहा- ठीक है, देखती हूँ ! अगर आज तूने मेरी आग बुझा दी तो मैं जिन्दगी भर के लिए तेरी गुलाम बन जाऊँगी, जब तू कहेगा तब तुझसे करवाऊँगी लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो मैं तेरी गाण्ड में मेरा प्लास्टिक का लण्ड डाल दूंगी ! बोल मंजूर है तुझे?
मुझे तो पहले से ही मालूम था कि जब में दो बार ठंडा हो चुका हूँ तो तीसरी बार तो उसकी पम्मी का बैंड बजना ही है।
तो मैंने हाँ कर दी यानि उनकी शर्त को मंजूर कर लिया।
अब मैं उनकी पम्मी को चूसने लगा ताकि वो बहुत ज्यादा गर्म हो जाये, थोड़ी ही देर में वो अपनी गाण्ड यानि तरबूज उचकाने लगी। मैं समझ गया कि अब इसकी तो गई काम से !
फिर मैंने अपना पप्पू शेर लण्ड महाराज उनकी पम्मी में डाल दिया तो वो बोली- दम नहीं है क्या?
मैंने कहा- दम तो बहुत है लेकिन तुम्हारे में ताकत नहीं है, अगेर है तो तुम कर के बता दो।
तो उसने एकदम से मुझे धक्का दिया और पलंग पर गिरा दिया, फिर मेरे ऊपर चढ़ कर अपनी पम्मी में मेरा पप्पू डलवा कर उछलने लगी। आखिर कब तक उछलती, आखिर में उनकी वो घड़ी आ ही गई जिसका मुझे बेसब्री से इंतज़ार था और वो चिल्लाती हुई मेरे ऊपर ही गिर गई।
तब मैंने कहा- क्या हुआ मैडम जी? थक गई?
तो उन्होंने हाँ भरी और पलंग पर सीधी लेट गई।
तब मैं तुरंत उनके ऊपर चढ़ गया और शुरु कर दी चुदाई।
वो बोली- क्या कर रहे हो? मेरा तो हो चुका है !
तब मैंने कहा- मैडम, मेरा शेर लम्बी रेस का घोड़ा है, इतनी जल्दी नहीं थकता है, अभी तो आपको एक बार और ठंडा होना है।
थोड़ी ही देर में वो बड़बड़ाने लगी- भोसड़ी के चोद ना ! और जोर से चोद ! मादरचोद फाड़ डाल आज इसको ! साली कुत्ती रांड बहुत ज्यादा फड़कती है यह ! आज फाड़ डाल इसको ताकि कभी उस चूतिये का 6 इंची लेने का मन ही न करे !
मेरा छुटने को था तो मैंने उनसे कहा- बोलो, अन्दर ही डाल दूँ अपना रस?तो वो बोली- अन्दर ही डाल दो ! उस गरमा गरम रस को मैं अपने अन्दर लेना चाहती हूँ और तुम्हारे बच्चे की माँ बनाना चाहती हूँ ! बोलो बनाओगे न मुझे अपनी बाहर वाली बीवी ? बोलो?
तब मैंने हाँ भर दी और अपना सारा रस उसकी पम्मी में डाल दिया।
फिर थोड़ी ही देर में कहा- अब रोजाना तुम मुझसे वो सब कुछ करवाओगी जो मैं चाहूँगा?
तो उसने हामी भर दी। फिर जब भी उनके पति बाहर जाते तो वो मेरी मम्मी को बोल कर मुझे अपने घर पर रात को सोने के लिए बुला लेती और मैं उनके घर पर चला जाता था और उनकी जम कर चुदाई करता !
आज हम दोनों के एक बेटा है जो सात साल का हो गया है। मेरे पापा का ट्रांसफर हो गया था तो हम सभी पापा के साथ उनकी नई पोस्टिंग वाली जगह पर चले गए थे। अभी कुछ ही दिनों पहले मैंने उनके पति को अपने शहर में देखा था उनकी अपनी ही बाइक पर ! शायद वो लोग भी इसी शहर में आ गए हैं। अब मैं उन्हें ढूंढ़ रहा हूँ ताकि हम दोनों अपनी सेक्स की दास्ताँ आगे बढ़ा सकें।
तो दोस्तो, यह थी मेरी पहली सबसे प्यारी चुदाई की कहानी !
आपको कैसी लगी, इस बारे में आप मुझे अपनी अपनी राय मेल कर सकते हैं।

लड़की से औरत बनी-3


में अपनी उम्र और फिगर लिखना भूल गई थी, आप सबने जानना चाहा है तो मैं बता दूँ कि इस वक़्त मेरी उम्र 24 साल और फिगर 34-28-36 है परन्तु जब मेरी सील टूटी तब उम्र 20 साल और फिगर 32-26-34 थी।
आप सभी के बहुत से मेल और मैसेज मुझे लगातार मिल रहे हैं, अधिकतर दोस्तों ने मेरे मुझे चोदने की तमन्ना की है।
आप सबको मेरा प्यारा सा चुम्बन। मैं आप सबसे माफ़ी चाहती हू कि सबके मेल का जबाब नहीं दे पाऊँगी, न ही सब से चुदा सकती हूँ। लेकिन कुछ दोस्तों को यह मौका जरुर दूँगी। आप मेरी आप बीती अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं।
मुझे रमेश का दोस्त चोद रहा था और मैं दर्द और आनन्द की मिश्रित आहें भर भर के चुदा रही थी। उसके सीने से मेरी चूचियाँ पिस सी रही थी, उसके सीने के बाल मेरे चुचूकों से रगड़ खाकर मुझे स्वर्ग की सैर करा रहे थे। अब मेरी चूत उसके लण्ड के अनुरूप फ़ैल चुकी थी और पूरे लण्ड को गपागप निगल रही थी, उसकी और मेरी झांटे आपस में रगड़ खा जाती थी। चुदाई में इतना आनन्द आता है, मैंने कल्पना भी नहीं की थी, अन्यथा कब की चुदा चुकी होती।
आनंद के अतिरेक में मैं अपनी चूत को ऊपर उठा देती तो उसका लण्ड मेरी बच्चेदानी से टकराता तो दर्द से कराह देती थी।
अब मेरी नींद पूरी तरह खुल चुकी थी, नशे की खुमारी भी कम हो गई थी, मैं समझ चुकी थी कि रमेश अपने दोस्त को बुला कर मेरी चुदाई करा रहा है लेकिन अंदर अंदर खुश थी कि इसी बहाने इतना मज़ा मिल रहा है।
मैंने अपने पैर उसके कूल्हों पर लपेट लिए और जब वो लण्ड अन्दर पेलता तो मैं अपनी गाण्ड ऊपर को उठा देती ताकि पूरा लण्ड मेरी चूत निगल सके।
करीब आधा घंटा चुदने के बाद मैं झड़ने लगी तो मैंने अपने पैरों और हाथों से उसे क़स लिया और मज़ा लेकर पूरा रज उसके लण्ड पर गिरा दिया। मेरी चूत के रस को पीकर उसका लड़ मस्त हो गया और मस्ती को संभाल नहीं सका और वो भी गिराने लगा मेरी चूत में ही और पूरी चूत अपने रस से भर दी।
उसका माल चूत से निकल कर गाण्ड से होता हुआ बिस्तर की चादर पर गिर रहा था।
वह कुछ देर तक ऐसे ही मेरे ऊपर लेटा रहा फिर बाथरूम चला गया।
मैंने करीब दस मिनट बाद उठ कर रमेश को आवाज़ दी तो रमेश आ गया।
फिर मैंने अनजान बन कर कहा- इस बार तुम्हारा लण्ड बहुत मोटा लग रहा था?
तो वो मेरे बदन से चिपक के लेटा रहा और मेरी चूचियाँ मसलने लगा। उसका लण्ड खड़ा था तो मैंने कहा- अभी अभी चोद कर गए हो और यह फिर खड़ा है?
तो रमेश बोला- वो मेरा दोस्त था जिसने तुझे अभी अभी चोदा !
तो मैंने नाराज़गी दिखाते हुए कहा- उससे क्यों चुदवाया मुझे ?
तो बोला- जान, तुमने ही कहा, तब उसे बुलाया और कितना मज़ा ले लेकर चुद रही थी?
मैंने नाराज़गी दिखाई कि तुमने धोखे से अपने दोस्त को बुला कर मेरी चूत जूठी करा दी तो वो कहने लगा- डार्लिंग, तुमने हाँ की तभी उससे कराया ! अब माफ़ कर दो !
थोड़ी देर बाद मैं मान गई तो अपने दोस्त को आवाज़ दे कर दूसरे कमरे से बुला लिया। वो मेरा पड़ोसी और मेरे पापा का दोस्त अनिल था। वैसे तो वो उम्र में पापा से छोटा था, करीब 35 साल का होगा मैं उसे अंकल बोला करती थी।उसे देख कर मैंने शर्म से अपना मुँह छुपा लिउआ।
वो मेरे बिस्तर पर बैठ गया और कम्बल में हाथ डाल कर मेरी गाण्ड और चूत सहलाने लगा और बोला- अब मुझे अंकल नहीं, डार्लिंग कहना ! अब हम दोनों तुम्हारे प्रेमी और पति हैं। कई साल से तुम्हारी गाण्ड और चूत की सोच कर मुठ मारते रहे हैं, आज नंगी देखने और चोदने को मिल गई हो ! पता नहीं क्या पुण्य किये थे हमने जो तुम जैसी अप्सरा को चोदने का मौका मिला।
उसने मेरे मुँह से कम्बल हटा दिया और बोला- शरमाओ मत डार्लिंग, मज़ा लूटो !
अनिल मेरे होंठ चूसने लगा और मेरी गाण्ड में ऊँगली पेल दी।
मैंने गाण्ड हिला कर उसकी ऊँगली निकाल दी तो बोला- जब वो चोद रहा था तब गाण्ड खूब पाद रही थी। इसका मतलब इसको भी लण्ड चाहिए।
मैं बस मुस्कुरा दी तो बोला- वाह डार्लिंग, तेरी इसी मुस्कराहट पर तो हम मरते हैं।
अनिल ने मेरे नंगे बदन से पूरा कम्बल हटा दिया। मैं शरमा कर एक हाथ से चूत और दूसरे हाथ से चुचिया छुपाने का प्रयास करने लगी।
यह देख कर दोनों हँस पड़े और मेरे दोनों तरफ़ लेट गए और मुझे प्यार करने लगे।अनिल मेरे होंठ चूस रहा था और रमेश मेरे चूचे !
मेरी एक जांघ अनिल ने अपने जांघों में दबा रखी थी और दूसरी रमेश ने ! इस कारण मेरी चूत और गाण्ड दोनों फैले हुई थी। दोनों के लण्ड मेरे हाथों में थे। अनिल का लण्ड सोया हुआ था लेकिन रमेश का लण्ड फुफकार रहा था। चूत पर रमेश की उंगलियाँ चल रही थी जबकि दूसरा मम्मा अनिल मसल रहा था। चूत पानी निकाल कर पुनः चुदने को तैयार है, इसका सन्देश दे रही थी।
फिर अनिल अपना हाथ मेरे चूतड़ों के नीचे डाल कर गाण्ड में ऊँगली डालने लगा और होंठ छोड़ कर स्तन चूसने लगा।
अब हालत यह थी कि अनिल और रमेश के कब्ज़े में एक एक जांघ और एक एक मम्मा था, रमेश के पास चूत थी तो अनिल चूतड़ों के नीचे हाथ डाल कर गाण्ड में ऊँगली पेल रहा था।
मैं तो मदहोश थी, मेरी आँखें बंद हो चुकी थी और मुँह से कामुक सिसकारियाँ निकल रही थी।
अनिल जब गाण्ड में ऊँगली ज्यादा पेल देता तब दर्द तो नहीं लेकिन चुभन हो जाती तो गाण्ड हिला कर मैं ऊँगली निकालने का असफल प्रयास करती।
लेकिन दो भूखे शेरों के बीच फंसी हिरनी जैसा हाल था मेरा ! फर्क यही था कि हिरनी को शेरो से ज्यादा आनन्द आ रहा था।
फिर मोर्चा रमेश ने संभाला और मेरी जांघों के बीच आ गया।
अब मेरी चूत उसके लण्ड के आगे थी उसने चूत के होंठों को फैला के अपना सुपारा चूत में रख कर धक्का मारा तो लण्ड गपाक से घुस गया।
मेरी गाण्ड से पु ऊऊ करके पाद निकल पड़ी तो अनिल बोला- जान, अब तुम्हारी चूत का आकार तो मेरे लण्ड का हो गया है, इसके लण्ड पर तो मत पादो !
मैं बस मुस्कुरा दी।
फिर रमेश मेरी चूत चोदने लगा।
अनिल सच ही बोल रहा था, रमेश का लण्ड आसानी से आ-जा रहा था, दर्द बिल्कुल नहीं हो रहा था और मैं गाण्ड उठा-उठा कर लण्ड खा रही थी।
पूरा कमरा आह आह्ह ऊह्ह उह की आवाज़ से गूंज रहा था।
अनिल गाण्ड सहला रहा था और चूचे चूस और मसल रहा था। उसकी उंगलियाँ मेरी चूत के होंठों का फैलाव भी चेक कर रही थी।
फिर उसने एक ऊँगली गाण्ड में डाल दी पूरी ! और आगे-पीछे करके ऊँगली से चोदने लगा।
अब अनिल का लण्ड भी फुफकारने लगा था, उसने उठ कर मेरे मुँह के पास अपना लण्ड कर दिया, खड़ा होने के बाद उसका लण्ड बहुत बड़ा हो गया था, मैं उसके सुपारे पर जीभ फेरने लगी तो मुझे भी अच्छा लगा और लण्ड और तमतमा गया।
फिर मैं सुपारा चाटने लगी और उसने मेरे मुँह में लण्ड डाल दिया। अब मेरी चूत और मुँह की चुदाई एक साथ होने लगी।
रमेश चूत का बाजा बजा रहा था तो आनिल मुँह में चोद रहा था। मुँह में जब ज्यादा अंदर लण्ड पेल देता तो मेरी साँस रुक जाती थी।
करीब आधे घंटे बाद मैं रमेश के लण्ड पर झड़ गई और उसके लण्ड को अपने काम-रस से नहला दिया।
रमेश को हटा कर अनिल मेरी चूत पर अपना मुँह लगा कर मेरा सारा रस पीने लगा और चूत को चूसने लगा।
मुझे असीम आनन्द आ रहा था।
रमेश उठ कर मेरे मुँह के पास आ गया और अपना मेरी चूत के रस से भीगा लण्ड मेरे मुँह के आगे कर दिया।
मैं उसके लण्ड के मोटे हिस्से को चाटने लगी तो उस पर मेरा और उसका मिश्रित रस बड़ा स्वादिष्ट लगा। फिर मैं उसे पूरा चूसने लगी तो वो जोश में भर गया और अपना माल मेरे मुँह में छोड़ने लगा। जब तक मैं उसका लण्ड मुँह से निकालती, तब तक ढेर सारा माल मुँह में भर गया और बाकी मेरे चेहरे और चूचियों पर गिरा।
मुँह वाला माल मैं निगल गई लेकिन लगा कि उलटी हो जाएगी परन्तु संभल गई। जो माल चूचियों और चेहरे पर गिरा, उसकी मालिश उसने कर दी।
आगे क्या हुआ?
आप लोगों के जबाब मिलने के बाद लिखूंगी।
आप सबकी दोस्त
पूनम

जोगिंग पार्क-3

जोगिंग पार्क-3

नेहा वर्मा एवं शमीम बानो कुरेशी
फ़िर एक दिन मैं जब सवेरे विजय के यहाँ गई तो वहाँ उसका एक दोस्त और था। मैं उसे नहीं जानती थी... पर वो मुझे जानता था। उसने अपना नाम प्रफ़ुल्ल बताया था, पर लोग उसे लाला कहते थे। मुझे वहाँ रोज आता देख कर वो भी विजय के यहाँ आने लगा था। शायद वो मेरे कारण ही आता था। धीरे धीरे वो भी मेरे दिल को छूने लगा था लेकिन लाला के कारण हमारा खेल खराब हो चला था।
एक दिन शाम को विजय मेरे घर आ गया...
मेरे घर में एकांत देख कर उसने राय दी कि यहाँ मिलना अच्छा रहेगा। पर हमें जगह तो बदलनी ही थी, उसके घर के आस पास वाले अब हम दोनों के बारे में बातें बनाने लग गये थे।
अब हम दोनों मेरे ही घर पर मिलने लगे थे। पर मुझे लाला की कमी अखरने लग गई थी तो उसे मैंने पार्क में ही मिलने को कह दिया था। अब हम तीनों ही पार्क में जॉगिंग किया करते थे। मैं लाला से भी चुदना चाहती थी... मेरी दिली इच्छा थी कि दोनों मिल कर मुझे एक साथ चोदें।
यहाँ से अब लाला की कहानी भी शुरू होती है। मेरी फ़ुद्दी रह रह कर उसके नाम के टसुए बहा रही थी। वैसे भी जिसके साथ भी मेरी दोस्ती हो जाती थी, वो मुझे भाने लगता था और स्वयमेव ही चुदाने की इच्छा बलवती होने लगती थी।
मैं विजय की गोदी में बैठी हुई थी, एक दूसरे के अधरों को रह रह कर चूम रहे थे। विजय का लण्ड मेरी चूतड़ों की दरार में फ़ंसा हुआ था। मैं लाला को पटाने का माहौल बना रही थी। मैंने उसी को आधार बना कर वार्ता आरम्भ की।
"विजय कभी तुम्हारी इच्छा होती है कि दो दो लड़कियों को एक साथ बजाओ?" मैंने बड़े ही चालू तरीके से पूछा।
"सच बताऊँ, बुरा तो नहीं मानोगी... ? इच्छा किसकी नहीं होती एक साथ दो लड़कियों को चोदने की, मुझे भी लगता है दो दो लड़कियाँ मेरा लण्ड मसलें और मुझे निचोड़ कर रख दें... मेरा जम कर पानी निकाल दें..."
"आ... आ... बस बस... सच कहते हो... मेरी सहेली पूजा को पटाऊँ क्या? साली की चूत का भोंसड़ा बना देना !" उसे लालच देती हुई बोली।
"यह पूजा कौन है? उसे भी जोगिंग के लिये ले कर आओ... फिर तो पटा ही लेंगे दोनों मिल कर... फिर देखो कैसे उसकी पूजा करते हैं !"
"कितना मजा आयेगा, हम दोनों मिल कर तुमसे प्यार करेंगे और फिर तुम्हारा माल निकालेंगे... फिर देखो मुझे चूतिया बना कर गोल मत कर देना?"
"अच्छा ! तुम बताओ... तुम्हें अगर दो दो मस्त लण्ड मिल जायें तो... बहुत बड़ी-बड़ी बातें करती हो..."
"हटो, मेरी ऐसी किस्मत कहाँ है... एक तो तुम ही बड़ी मुश्किल से मिले हो... दूसरा लौड़ा कहाँ से लाऊँ?" मैंने बड़ी मायूसी से कहा।
मैं तो लाला की बात कर रहा हूँ... उसकी नजर तो तुम पर है ही ! हो गये ना हम दो... " यह सुन कर मेरा मन खुशी से भर गया।
"अरे नहीं रे... मैं तुम्हारा दिल नहीं दुखाना चाहती हूँ...।" मैंने विजय को चूमते हुये उसे अपनी बातो में ले लिया और उसका लण्ड पकड़ कर हिलाने लगी।
"नेहा, तुम कोई मेरी बीवी तो हो नहीं, अगर तुम साथ में लाला से भी मजे ले लो तो मेरा क्या जाता है... बल्कि तुम्हें तो दो दो लौड़ों का मजा ही आयेगा ना?" वो मुझे समझाने लगा।
"सच विजय, यू आर सो लवली, सो स्वीट... मैं भी पूजा को ले आऊँगी... तुम उससे मजे लोगे तो सच में मुझे भी बहुत अच्छा लगेगा।" पूजा मेरी नौकरानी थी, मैंने सोचा उसे जीन्स पहना कर कॉलेज गर्ल बना कर विजय से चुदवा दूंगी।
अब हम दोनों प्यार करते जा रहे थे और लाला को पटाने की योजना बनाने लगे।
सोच समझ कर हमने आखिर एक योजना बना ही डाली। इसमे विजय भी मेरी मदद करेगा। मेरा दिल खुशी के मारे उछलने लगा। लाला और विजय का लण्ड अब मुझे एक साथ मेरे जिस्म में घुसते हुये महसूस हुए। मैंने जोश में उसका लण्ड अपनी गाण्ड में घुसा लिया। उस दिन मैंने अपनी गाण्ड खोल कर विजय से मन से चुदाया।
मुझे चोद कर विजय चला गया। शाम को पूजा को मैंने विजय की बात बताई। पूजा बेचारी रोज छुप छुप कर मुझे चुदते देखती थी, वो सुन कर खुश हो गई। मैंने विजय को मोबाईल पर फ़ोन करके शाम को बुला लिया और उसे पूजा से मिलवा दिया।
"विजय यह मेरी खास सहेली है... इसे जरा मस्ती से चोदना... बेचारी बहुत दिनों से नहीं चुदी है...देखो, कहीं यह बदनाम ना हो जाये..."
"नेहा... यह मेरी भी खास बन कर ही रहेगी... पूजा आओ, बन्दा आपको आपको सिर्फ़ आनन्द ही आनन्द देगा।"
मैं उन दोनों को अपने बेडरूम में ले गई और कमरा बाहर से बन्द कर दिया। कुछ ही देर में अन्दर से सिसकियाँ और आहें भरने की उत्तेजनापूर्ण आवाजें आने लगी। मैंने अपनी चूत दबा ली और रस को अपने रूमाल से पोंछने लगी।
करीब आधे घण्टे के बाद उन्होंने बाहर आने के लिये दरवाजा खटखटाया। मैंने दरवाजा खोल दिया। पूजा की आँखें वासना से लाल थी, जुल्फ़ें उलझी हुई थी, जीन्स भी बेतरतीब सी थी, टॉप चूचियों पर से मसला हुआ साफ़ नजर आ रहा था, साफ़ लग रहा था कि उसकी मस्त चुदाई हुई है।
विजय भी मुस्कराता हुआ बाहर आया जैसे कि किसी कि कोई मैदान मार लिया हो। मैंने पूजा को चूम लिया।
"बेबी... मस्ती से चुदी है ना... तेरा चेहरा बता रहा है कि मजा आया है... अब तू जा... जब मन करे चुदने का तो विजय को बुला लेना !"
एक तीर से दो काम करने थे मुझे। विजय यूँ तो मुझे चोदता ही... मेरे पति के आने पर पूजा को मेरी जगह चोदता... तब मैं सुरक्षित रहती।
आज तो दिन को ही लाला विजय के यहाँ आ गया था। उसे पता था कि वो थोड़ी देर में मेरे घर जायेगा। मुझ तक पहुँचने के लिये उसे विजय की चमचागिरी तो करनी ही थी ना।
"लाला, भोसड़ी के ! एक बात बता... तुझे यह नेहा कैसी लगती है?" विजय अपनी लड़कों वाली भाषा का प्रयोग कर रहा था।
"जवानी की जलती हुई मिसाल है... मुझे तो बहुत प्यारी लगती है... चालू माल है क्या?"
"एक बात है यार... मुझे भी वो मस्त माल लगती है... तू कहे तो उसे पटायें..."
"कह तो ऐसे रहा है जैसे कोई लड्डू है जो खा जायेगा... दोस्त है, दोस्त ही रहने दे... कहीं दोस्ती भी हाथ से ना निकल जाये?"
"कब तक यार उसे देख देख कर मुठ मारेंगें ... कोशिश तो करें... अगर पट गई तो दोनों मिल कर साली को चोदेंगें।"
"चल मन्जूर है, देख अपन साथ ही चोदेंगे... देख विजय ... मुझे धोखा ना देना...यार देख मेरा तो लण्ड अभी से जोर मार रहा है।"
मुझे विजय का फोन आया कि लाला मुझे चोदने के लिये तड़प रहा है। मुझे अब लाला से चुदने की तैयारी करनी थी। मैंने पलंग को एक कोने में कर दिया और जमीन पर मोटा गद्दा डाल दिया। जमीन पर बिस्तर पर खुल कर चुदा जा सकता था।
जैसे ही बाहर दो मोटर साईकल रुकी, मेरा दिल धड़क उठा। मैंने बाहर झांक कर बाहर देखा। विजय और लाला ही थे। दोनों आपस में कुछ बाते कर रहे थे। तभी मेरे मोबाईल पर विजय का मिसकॉल आया। यह विजय का इशारा था। मेरा दिल अब जोर जोर से धड़कने लगा था। मुझे पसीना आने लगा था।
दोनों अन्दर आए तो मैं लाला को देख कर बोली- अरे तुम कैसे आ गए?
विजय बोला- मैं ले आया इसे अपने साथ ! तुझे चोदना चाहता है !
लाला कभी विजय को तो कभी मुझे देख रहा था हैरानी से कि विजय कैसे खुल्लमखुल्ला बोल रहा है।
लाला को इस तरह अपनी ओर देखते हुए विजय बोला- क्या देख रहा है बे? मैं तो इसे कई बार चोद चुका हूँ। और इसी साली ने तो मुझे कहा था कि दो लण्ड एक साथ लेना चाहती है तो मैं तुझे पट कर ले आया। तेरी नजर भी तो थी ही ना इस पर !
मैं शरमाते हुए बोली- विजय, क्या बकवास कर रहे हो?
मुझे नहीं पता था कि विजय इस तरह मेरी पोल खोल देगा।
लाला ने आगे बढ़ कर मुझे दबोच लिया।
"लाला... अरे... दूर हटो... क्या कर रह हो?" पर सच कहूँ तो मुझे स्वयं ही इसकी इच्छा हो रही थी।
"तेरी माँ दी फ़ुद्दी... ऐसी मस्त गाण्ड और चूत कहां मिलेगी !" लाला जैसे अपना आपा खो चुका था। उसके अंग अंग फ़ड़क उठे। मेरे स्तन उसने मसल दिये। उसने मुझे अपनी बाहो में उठा कर नीचे गद्दे पर पटक दिया, मेरे ऊपर आकर मुझे दबा लिया, उसके शरीर का दबाव मुझे बड़ा मोहक लगा।
"साली की मस्त चूत चोद डालूँगा !" वो बड़ी कुटिलता से मुस्करा कर अपनी पैन्ट खोल रहा था जैसे मैदान मार लिया हो।
इतने में विजय को पुकारते हुए मैं बेशरमी से बोली- विजय, मुझे बचा लो... देखा लाला मुझे चोदने पर तुला है...
लाला मेरी मैंने विजय को आँख मारी। विजय ने मेरी मैक्सी उठाते हुए मेरे गले से निकाल कर फ़ेंक दी। अन्दर मैंने कुछ पहना ही नहीं था तो मैं अब मादरजात नंगी हो गई थी।
"साली को छोड़ूंगा नहीं... मां कसम चिकनी है... चूत मारने में बहुत मजा आयेगा।"वो वासना में जैसे उबल रहा था।
मैं अभी भी नखरे दिखाने को मचल रही थी जैसे उससे छूटना चाह रही हूँ। तभी विजय ने मेरी टांगे पकड़ ली और दोनों ओर खींच कर मेरी चूत भी खोल दी। मैंने भी चूत अपनी फ़ाड़ कर खोलने में सहायता की।
"विजय तुम भी... हाय अब क्या करूँ... लगता है मेरी फ़ुद्दी की मां चोद देंगे।"
"विजय बोला- भोसड़ी की मस्त माल है , जरा जम के चोद डाल इसे... फिर मैं भी इसकी चोदूँगा।
"थेंक्स विजय... मेरे दोस्त... मुझे नेहा जैसा मस्त माल को चोदने में मेरी मदद की... भेन दी लण्ड !"
तभी लाला का फ़ौलादी लण्ड मेरी चूत में घुस पड़ा। मेरे मुख से आह्ह निकल गई। मैंने धीरे से विजय को आंख मार दी।
"लाला। मर गई ... हाय राम... ये क्या किया तूने... अब तो छोड़ दे... घुसेड़ दिया रे !" और मैंने लाला की बाहे अब जकड़ लिया। मस्ती से मेरे दांत भिंच गये।
विजय ने भी अपने कपड़े उतार लिये और लण्ड मेरे मुख के समीप ले आया,"चल चूस ले मां की लौड़ी ... जरा कस कर चूसना... निकाल दे मेरा माल ..."
"दोनों साले हरामी हो... देखना भेन चोदो... तेरे लण्ड का भी पानी ना निकाल दूं तो कहना !" मेरे मुख से भी जोश में निकल पड़ा।
"यह बात हुई ना... मादर चोद ... रण्डी... छिनाल साली... तेरी तो आज फ़ोड़ के रख देंगे।" उसकी गालियाँ मेरी उत्तेजना बढ़ा रही थी। मुझे किसी ने आज तक ऐसी मीठी मीठी... रसभरी गालियाँ देकर नहीं चोदा था। विजय का मस्त लण्ड मेरे मुखद्वार में प्रवेश कर चुका था। आज मेरे दिल की यह इच्छा भी पूरी हो रही थी- दो दो जवान चिकने लौंड़ो से लण्ड लेने की इच्छा...।
किसकी किस्मत में होता है भला दो दो लण्ड से एक साथ चुदाना। मुझे पता था कि अब मेरी आगे और पीछे से जोरदार चुदाई वाली है। लाला का लण्ड मेरी चूत को चीरता हुआ गहराई में बैठता जा रहा था। मेरी सिसकियाँ निकल रही थी। दुसरी और विजय का लण्ड मुख को चोदने जैसा चल रहा था। मैंने विजय को बेकरारी में आँख मारी... वो समझ गया।
"लाला, इस मां की लौड़ी को अपने ऊपर ले ले... मैं भी जरा प्यारी सी नेहा की गाण्ड बजा कर देखूँ !" मैं विजय की बात पर मुस्करा उठी। लाला ने मुझे दबा कर पलटी मार दी और मै उसके ऊपर आ गई... मैंने लाला के लण्ड पर जोर मार कर फिर से उसे चूत में पूरा घुसा लिया और अपने चूतड़ खोल दिये। मेरा शरीर सनसना उठा कि अब मेरी गाण्ड भी चूत के साथ साथ चुदने वाली है।
तभी मेरी चिकनी गाण्ड में विजय का लौड़ा टकराया। मैं लाला से लिपट पड़ी।
"लाला देख ना विजय ने अपना लौड़ा मेरी गाण्ड में लगा दिया है... क्या यह मेरी गाण्ड मारेगा?"
"देखती जाओ, मेरी छम्मक छल्लो ... हम दोनों मिल कर तेरी क्या क्या मारते हैं... भोसड़ी की... चूतिया समझ रखा है? क्या तू बच जायेगी... साली को फोड़ के नहीं रख देंगे।"
"अरे जा... बड़ा आया चोदने वाला... हरामी का लण्ड तो खड़ा होता नहीं है... बाते बड़ी बड़ी करता है।"
"विजय... गण्डमरी को छोड़ना नहीं... दे साली की गाण्ड में लौड़ा..." विजय तो जानता था कि मैं जोरदार चुदाई चाहती हूं, इसलिये मैं लाला को भड़का रही हूँ।
विजय का लण्ड भी मेरी गाण्ड में घुसता चला जा रहा था। आह्ह्ह्...... मस्त दो दो लण्ड... कैसा अद्भुत मजा दे रहे थे। मुझे आज पता चला कि चूत और गाण्ड के द्वार एकसाथ कैसे खुलते है और लण्ड झेलने में कितना मजा आता है। मेरी अन्तर्वासना की सखियो ... मौका मिले तो जरूर से दो दो लण्डों का आनन्द लेना।
आह्ह्ह रे दोनों लण्ड का अहसास... मोटे मोटे अन्दर घुसते हुये ... मां री ... मेरा जिस्म आनन्द से भर गया। पूरे शरीर में मीठी सी लहर उठने लगी। मेरे कसे हुये और झूलते हुये स्तन विजय ने पीछे से थाम लिये और दबा लिये।
मेरी स्थिति यह थी कि मैं अपने चूतड़ दोनों ओर से दबे होने कारण उछाल नहीं पा रही थी। अन्ततः मैं शान्ति से लाला पर बिछ गई और बस दोनों ओर से लण्ड खाने का आनन्द लेने लगी। कैसा अनोखा समा था। दोनों के लण्ड टनटना रहे थे...फ़काफ़क चल रहे थे... मैं दोनों के मध्य असीम खुशी बटोर रही थी। मन कर रहा था कि ऐसी मस्त चुदाई रोज हो। हाय रे... मेरी चूत और गाण्ड दोनों ही चुद रही थी ... ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी कि काश यह लम्हा कभी भी खत्म ना हो बस जिन्दगी भर चुदती ही रहूँ।
तभी विजय के मुख से कराह निकली और उसका वीर्य गाण्ड की कसावट के कारण रगड़ से निकल पड़ा। उसने अपना लण्ड बाहर निकाला और बाकी बचा हुआ वीर्य लण्ड मसल मसल कर निकालने लगा। तभी दोनों ओर की चुदाई के कारण मैं अतिउत्तेजना का शिकार हो गई और मेरा रज भी छूट गया। मैं झड़ने लगी थी। कुछ ही पल में लाला भी झड़ गया। मेरी चूत के आस पास जैसे लसलसापन फ़ैल गया, नीचे गंगा जमुना बह निकली। मैं लाला के ऊपर पड़ी हुई थी। विजय उठ कर खड़ा हो गया था और मेरे चूतड़ों को थपथपा रहा था।
कुछ ही समय के बाद हम अपने कपड़े पहन कर सोफ़े पर बैठे हुये चाय पी रहे थे।
लाला आज बहुत खुश था कि आज उसे मुझे चोदा था। ये कार्यक्रम मेरा मस्ती से छः महीनो तक चलता रहा। पूजा अब लाला से भी चुदवाने लगी थी। तभी कनाडा से सूचना आई कि मेरे पति दो दिन बाद घर पहुंच रहे हैं।
मैंने विजय और लाला को इस बारे में बताया कि अब ये सब बन्द करते है और मौका मिलने पर फिर से ये रंग भरी महफ़िल जमायेंगे। पर हां जोगिन्ग पार्क मे हम नियम से रोज मिलेंगे। पूजा दोनों के लण्ड शान्त करती रहेगी। वो उदास तो जरूर हुये पर पूजा ही अब उनका एक सहारा था। पूजा भी बहुत खुश नजर आ रही थी कि अब उसकी चुदाई भरपूर होगी...
आपकी
नेहा और शमीम बानो कुरेशी

गौने से पहले-1

गौने से पहले-1

प्रेषक : ए के
मैं एक 32 वर्षीय पुरुष हूँ, उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूँ। मैं जैसे ही 22 साल का हुआ, मेरी शादी कर दी गई और मेरी शादी होते ही मुझे मुंबई में नौकरी मिल गई। और जैसा कि आप सब जानते ही होंगे कि हमारे यहाँ शादी में बीवी को विदा नहीं करते, तीन साल बाद गौना आता है। तब मुझे अकेले ही मुंबई जाना था।
उन दिनों मुंबई में हमारा कोई नहीं था पर हमारे पड़ोस के गाँव के रामू काका दादर में रहते थे तो मैं उनके पास चला आया और उनसे अपनी नौकरी के बारे में और रहने के बारे में बात की। उन्होंने मुझे कुछ दिनों तक अपने साथ रहने के लिए कहा, मैं भी तुरंत राजी हो गया क्योंकि मेरे पास और कोई चारा भी नहीं था।
रामू काका अपनी बीवी और एक अठारह वर्षीय पुत्री के साथ काफी समय से मुंबई रहते थे। अब मैं भी इनके घर का एक सदस्य बन गया था। रामू काका का बाकी परिवार गाँव में रहता था। रामू काका की पुत्री नीरू मुंबई के नेशनल कालेज की छात्रा थी और बहुत ही खुले विचारों की थी, वो मुझसे बहुत मजाक किया करती थी पर मैं बड़ा ही शर्मीला और वहम वाला लड़का था, मेरे विचार भी गाँव के लड़के की तरह थे और तो और मुझे हर वक़्त डर सा रहता था कि कहीं मेरी किसी बात से रामू काका बुरा न मान जाएँ और मुझे कहीं और जाकर रहने को न कह दें। मैंने अपने काम पर जाना शुरू कर दिया।
दिन बीतने लगे, अचानक रामू काका के भाई की तबीयत कुछ ख़राब हो गई जिसके कारण काकी व काका को गाँव जाना पड़ा और उन्होंने नीरू को सँभालने की जिम्मेदारी मुझे दे दी पर बात तो एकदम उलटी थी, नीरू ही मुझे सँभालने वाली थी क्योंकि मैं ठहरा गाँव का !
मेरे मन में कभी भी नीरू के लिए कोई गलत विचार नहीं था पर वो शहरी होने के नाते कुछ ज्यादा ही आगे थी। मैं और नीरू काका-काकी को स्टेशन पर छोड़ कर घर आये और काफी देर तक वो मुझे अपने कालेज के किस्से सुनाती रही, फिर उसने अपने बहुत से फोटो मुझे दिखाए।
एक बात कहता हूँ कि वो बला की सुन्दर थी और उसका भी ब्याह हो चुका था पर गौना नहीं गया था। यह उसके कालेज का आखिरी साल था।
रात का समय था, हमने खाना खा लिया था और मैं सोने की तैयारी कर रहा था पर वो मुझे जगाये रखकर कुछ और ही करवाना चाहती थी।
धीरे से वो मेरे बदन को सहलाने लगी, मुझे गुदगुदी होने लगी, मेरी बुद्धि काम नहीं कर रही थी कि वो क्या चाहती है सो मैंने भी उसको सहलाना शुरू कर दिया, मैंने सोचा यूँ ही मजाक-मस्ती कर रही होगी।
पर धीरे धीरे उसका हाथ मेरी कमर के नीचे जाने लगा तो मेरे बदन में मानो बिजली का झटका लगा। वो मुझसे सटने लगी और मेरे गाल पर एक चुम्बन जड़ दिया। फिर मुझे भी चूमने को कहा पर मुझे शर्म आ रही थी, मजाक मस्ती के आगे मैं नहीं जाना चाहता था क्योंकि मैंने फिल्मों में देखा था कि हीरो और हिरोइन जैसे ही एक दूसरे से चिपकते हैं, हिरोइन गर्भवती हो जाती है। बस इसी बात का डर मेरे मन में घर कर गया था कि नीरू गर्भवती हो गई तो रामू काका मुझे नहीं छोड़ेंगे, घर से निकाल देंगे और मेरे घरवाले भी मुझे मारेंगे।
पर नीरू कहाँ मानने वाली थी, उसने झट से मेरे शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए और साथ साथ अपने भी कपड़े निकालने लगी। कुछ ही पलों में हम बिल्कुल निर्वस्त्र हो गए थे और वो मुझे शांत करने मे लगी थी। ऐसा निर्वस्त्र बदन मैंने आज तक फिल्मो में भी नहीं देखा था, मैं तो दंग रह गया, जैसे मेरे होश ही उड़ गए हों।
ऐसी जवानी मैंने पहले कभी नहीं देखी थी, मुझे सेक्स का ज्ञान नीरू से मिला, वो मुझे पटक कर मुझ पर चढ़ गई और अपने हाथो से मेरे लण्ड को ऊपर-नीचे करने लगी, मुझे दर्द सा महसूस हो रहा था क्योंकि मैंने तब तक मुठ भी नहीं मारी थी।
उसकी गोलाइयाँ बहुत बड़ी थी, मैं उसकी चूचियों से खेलने लगा।
अब मेरा लण्ड भी फुंफकार रहा था और अपनी मंजिल पाने को बेकरार हो रहा था, उसने अपने हाथों से पकड़कर मेरे लंड को अपनी बुर में रखकर जोर से धक्का मारा और मेरे मुँह से चीख निकल गई जैसे किसी ने मेरा कुछ फाड़ दिया हो, चीखी जोर से वो भी और नीचे-ऊपर होने लगी।
धीरे धीरे हम कहीं और जाने लगे अब चारों तरफ आनन्द ही लग रहा था। वो अपने चूतड़ों को खूब हिला रही रही थी और मैं भी मस्त होकर उसका साथ दे रहा था। एक पल ऐसा आया कि हम जोर जोर से हाफ़ने लगे और एक दूसरे में समां गए। फिर तो जैसे मुझे धुन ही लग गई और मैंने रात भर में उसे छः बार चोदा।
दूसरे दिन न मैं काम पर गया और ना ही वो कालेज गई, हमने साथ साथ स्नान किया और रात के काम को दोहराया।
आगे क्या हुआ ? अगले भाग में आप पढ़ पाओगे तब तक के लिए यह गाँव का लड़का आपको नमस्कार करता है।

रुचि का शिकार-2

रुचि का शिकार-2

लेखिका : उषा मस्तानी
रुचि सीधे होकर मुझसे चिपक गई और बोली- सच राजीव, इतना मज़ा कभी चुदने में नहीं आया ! तुमने तो एक घंटे मेरी चूत में अपना लण्ड घुसा कर रखा। सच तुम तो वाकई मर्द हो ! मेरा आदमी तो दस मिनट में ही खाली हो जाता है।
मैंने रुचि को हटाते हुए कहा- चलो, एक एक ग्लास दूध पीते हैं, फिर दुबारा चोदता हूँ।
रुचि ने दूध गर्म किया और हमने एक एक ग्लास गरम दूध पिया।
दूध पीने के बाद रुचि मेरे सीने पर सर रखकर लेट गई और मेरा लण्ड अपने हाथ में पकड़ कर बोली- आपका लण्ड तो बहुत सुन्दर है, मुझे चुदने में जन्नत का मज़ा आया !
वो मेरे लण्ड की मुठ मारने लगी और बातें करने लगी, उसने पूछा- अब तक आपने अपनी बीवी के अलावा किस किस को चोदा है?
मैंने उसकी गाण्ड में चुटकी काटते हुए कहा- रानी, सच आज पहली बार दूसरी औरत की चूत में डाला है ! तुम्हारी चूत बहुत मस्त है, तुमने मुझे आज बहुत मज़ा दिया है, सच ! दूसरे की बीवी की मारने का अलग ही मज़ा है !
मैंने उसके चुचूक उमेठ-उमेठ कर खड़े कर रखे थे और उसकी योनि भी बीच बीच में सहला देता था।
रुचि बोली- आप बहुत बड़े झूठे हैं ! आपने सरीना की भी तो चूत चोदी होगी? तभी तो उन्होंने बताया कि आपका लण्ड इतना सुन्दर है, बिलकुल रवि जैसा !
रुचि एकदम संभलते हुए बोली- वो ! वो ! हीरो जैसा !
मैं बोला- रुचि जी, अब आपकी और मेरी दोनों की चोरी पकड़ी गई है ! बताइए, यह रवि कौन है?
रुचि बोली- मैंने कुछ दिन एक कोरियर कम्पनी में नौकरी की थी, उसके मालिक का 8 इंची लम्बा लण्ड था, दस हज़ार रु में उसने सरीना से मेरी चूत चोदने का सन्देश भिजवाया। मेरी चूत चुदने को मचल ही रही थी और मैंने पैसे लेकर अपनी चूत चुदवा ली। अब मुझे उससे चुदने में मज़ा आने लगा था कि उसकी बीवी ने पकड़ लिया और मुझे नौकरी छोडनी पड़ी। तब से मेरी चूत एक कड़क लण्ड के लिए मचल रही थी। सच, आज आपने इतने दिनों के बाद मेरी प्यास बुझाई है।
मैंने कहा- अब देखो, ये बेकार की बातें छोड़ो ! घोड़ा खड़ा हो गया है, दूसरे दौर के लिए तैयार हो जाओ।
रुचि बोली- ऊहं ! अभी थोड़ी बातें और प्यार करो न ! आपने एक घंटे मेरी मुनिया चोदी है ! अभी तक दर्द हो रहा है।
रुचि मेरे लण्ड की मुठ मार रही थी, मैंने अपनी एक ऊँगली उसके मुँह में डाल दी और उसे चुसवाने लगा। धीरे धीरे 2 उँगलियाँ मैंने उसके मुँह में डाल दीं। वो मस्त होकर मेरी उँगलियाँ चूस रही थी। रुचि ने अपनी आँखें बंद कर ली थीं।
इसके बाद मैंने बीच की ऊँगली पर अपना वीर्य लगाया और उसके मुँह में डाल दी।
हूँ... करती हुई उसने ऊँगली चूसी और आँखे खोलकर बोली- इसका स्वाद तो नमकीन सा, बड़ा अच्छा लग रहा है...
अब मैं ज्यादा सा वीर्य अपनी ऊँगली पर लगा कर चुसवाने लगा। इस बीच मैंने दूसरे हाथ की बिना वीर्य लगी ऊँगली उसके मुँह में डाल दी तो रुचि ने उसे निकालते हुए कहा- पहले वाली चुसवाओ ना !
वीर्य वाली ऊँगली चूसने में उसे बहुत मज़ा आ रहा था।
मैंने उसका हाथ लण्ड से हटा दिया और उसके चुचक उमेठते हुए बोला- रानी, यह जो स्वाद आ रहा है, यह लण्ड-रस का है जिसे ऊँगली में लगा कर मैंने तुम्हें चटाया है, मेरे लण्ड के अगले भाग को चाटो, मस्त हो जाओगी, आज रांड बन जाओ, फिर पता नहीं कब मज़ा लेने का समय आएगा।
रुचि बोली- आप लण्ड चुसवाने के लिए झूठ बोल रहे हैं !
मैंने बोला- तुम इस पर जीभ फिराओ अगर मज़ा न आये तो मुझे बताना।
रुचि उठी और मेरे लण्ड पर जीभ फिराने लगी। स्वाद चखते ही उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। मैंने उसकी चूत अपने मुँह की तरफ कर ली, अब हम 69 आसन में थे। रुचि ने मेरा लण्ड अब मुँह में ले लिया था। मैं उसकी चूत के दाने को होंठों में दबाये था, रुचि लपालप लण्ड चूस रही थी। मुझे लगा उसने झूठ बोला था कि उसने लण्ड कभी नहीं चूसा।
सामने एक पतली लम्बी गाज़र पड़ी थी, उस पर कंडोम लगा कर मैंने उसे रुचि की गाण्ड में घुसा दिया।
ऊह करते हुए उसने अपना मुँह हटाया और बोली- डार्लिंग, यह क्या कर रहे हो?
मैंने कहा- बहन की लौड़ी, गाज़र से घबरा रही है? जब गाण्ड में लौड़ा घुसेगा तब क्या करेगी? चुपचाप लौड़ा चूस ! मज़े भी लेना चाहती है और नखरे भी करती है?
रुचि मुस्करा दी और एक रण्डी की तरह फिर लौड़ा चूसने लगी।
मैंने भी अपना मुँह उसकी चूत में लगा दिया था और लम्बी गाज़र उसकी गाण्ड में आगे पीछे कर रहा था। तीनो छेदों का मज़ा रुचि ले रही थी।
कुछ देर बाद मैंने लौड़ा निकाल लिया और उससे बोला- पलंग पर हाथ रखकर तू जमीन पर घोड़ी बन ! तुझे अब घोड़ी बनाकर चोदता हूँ।
रुचि प्यार से घोड़ी बन गई तो घोड़ी बनी रुचि की चूत में मैंने लण्ड पेल दिया और उसे तेज धक्कों से चोदने लगा।
उसकी मस्ती भरी चीखें कमरे में गूंज रहीं थी- चोदो चोदो ! आह आह ! धीरे से ! फाड़ो ! मर गई राजीव ! धीरे से !
मैं जितनी तेज मार सकता था उतनी तेजी से धक्के मार रहा था, रुचि चिल्ला रही थी- राजीव, थोड़ा धीरे धीरे !
रुचि की सुरंग में लण्ड पूरी स्पीड से दौड़ रहा था। मैं भी मस्ती में चिल्लाने लगा- साली, चुद रण्डी ! हरामिन मुझे तेरी इस कसी चूत की भोंसड़ी बनानी है ! ले चुद ! चुद रण्डी साली चुद ले !
और मैंने उसकी फाड़नी जारी रखी। 2-3 मिनट बाद रुचि फिसल गई और जमीन पर गिर गई। मैंने उसे उठाया और चिपका लिया सामने कुर्सी पर वो मुझसे चिपट कर बैठ गई, रुचि बोली- राजीव तुमने तो सच मेरी फाड़ डाली है, बड़ा मज़ा आया !
मैंने उसे सीधा किया और अपनी जाँघों पर बैठा लिया। मेरा लण्ड हाथ में पकड़ते हुए बोली- तुम्हारा शेर तो अभी भी खड़ा है ! क्या गोली खाई है?
मैंने उसके चुचूक नोचते हुए कहा- गाली क्यों दे रही हो? यह सब तो सरीना की शिक्षा का असर है। दस दिन पहले तेरे पति की तरह मैं भी अपनी बीवी की 5-6 मिनट से ज्यादा नहीं चोद पाता था।
रुचि को मैंने अपने से चिपका लिया।
मैंने रुचि की चूचियाँ मसलते हुए कहा- एक बार और लण्ड पर बैठ लो !
रुचि मुस्कराते हुए सीधी हुई और मेरे लण्ड के मुँह पर अपनी चूत रख दी। मैंने हाथ से लण्ड उसकी चूत में थोड़ा सा घुसा दिया तो रुचि की गीली चूत मेरे लण्ड पर फिसल गई और एक बार फिर उसकी चूत में मेरा लण्ड घुसा हुआ था।
अब बिना कहे वो मेरे लण्ड पर उछलने लगी उसकी चूचियाँ भी मस्त हिल रहीं थीं, तभी सामने से उमा आ गई।
रुचि ने उछलना रोक दिया लेकिन लण्ड उसकी चूत में अंदर तक घुसा था।
उमा बोली- वाह भाई वाह ! क्या लण्ड घुसा हुआ है ! नज़र न लगे इसी तरह चूत चुदने का मज़ा लेती रहे मज़ा आ गया तेरे को चुदते देख !
चुचूकों को उमेठते हुआ उमा ने कहा- उछलो रुचि उछलो ! मज़ा लो इस जवानी का !
मैंने अब उसके दूध दोनों हाथों में दबा लिए थे और उसे कुर्सी पर बैठे-बैठे धीरे धीरे चोद रहा था। रुचि के कान में मैं बोला- उछल लो ! ऐसा मज़ा दुबारा कब मिलेगा !
रुचि फिर लण्ड पर उछलने लगी। उमा उसकी चुदाई देख देख कर मुस्करा रही थी।
कुछ देर बाद मैंने उसकी चूत से लण्ड निकाल कर उसे चारपाई पर सीधा लिटाया और उसके मुँह में लण्ड डाल दिया। रुचि ने दो बार ही लण्ड चूसा होगा कि मेरा वीर्य उसके मुँह में छुट गया। रुचि ने पूरा वीर्य अपने गले में ले लिया, मेरा लण्ड पकड़ कर उसे चाटने लगी और बोली- सच राजीव तुम्हारा लण्ड-रस तो बहुत ही स्वादिष्ट है।
थोड़ी देर में मेरा लण्ड ठंडा हो गया और मैं उसकी चूचियों पर मुँह रखकर लेट गया।
उमा बोली- भाई आठ बज़ रहे हैं ! चलो खाना खा लो ! नौ बजे शाकाल साहब के अड्डे पर रुचि को नंगी करवाती हूँ, बड़ा मज़ा आएगा।
रुचि बोली- नहीं उमा, मुझे डर लगता है ! धारावी में तो गुंडे चोदते भी हैं और मार भी डालते हैं।
उमा बोली- तेरी चूत राजीव जी के अलावा किसी और से चुदने नहीं दूँगी ! यह मेरा वादा ! और अगर तुझे नंगी अदाओं में मज़ा न आये तो कल मेरी जान ले लियो।
चल अब खाना खाते हैं। सरीना तो शाकाल जी के अड्डे पर चुदने में लगी है थोड़ी देर में हम भी चलते हैं।
कहानी का अगला भाग "शाकाल और नंगी हसीनाएँ" जल्दी आपको पढ़ने को मिलेगा।